जेल में सजा काटने के बाद भी बांग्लादेशी महिला 18 महीने से रिहाई और स्वदेश वापसी की आस लगाए बैठी है। कागजी प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण उसकी रिहाई अधर में लटकी हुई है। यह कहानी है बांग्लादेश के खालिसपुर, जिला- खुलना (डी.आई. डी. सी. रोड) की रहनेवाली रिया आफरीन रूपा पति – शाहजहां अली की। 27 साल की रूपा के बर्बादी की कहानी शुरु होती है 2019 से। रूपा को दो बेटे थे, छोटे बेटे की तबियत खराब हुई। स्थानीय किसी दलाल ने रूपा को कहा कि भारत चलो और वहां मैं तुम्हे नौकरी दिलवा दूंगा। उसी पैसे से तुम अपने बच्चे का इलाज करा सकोगी । दलाल कई दिनों तक भारत में अलग-अलग जगहों पर रूपा को घुमाता रहा। इस बीच रूपा मानव तस्करों का शिकार भी बन गई और 12 अक्तूबर 2019 को नालंदा जिला के नूरसराय थाना क्षेत्र के अहियापुर गाँव में भटकती हुई पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर ली गई।
गिरफ्तार कर भेज दिया गया जेल
दरअसल पुलिस को यह सूचना मिली की एक बांग्लादेशी महिला इस क्षेत्र में घूम रही है। नूरसराय पुलिस ने अहियापुर गांव से उसे गिरफ्तार किया। पुलिस ने बिना पासपोर्ट भारत में प्रवेश करने के जुर्म में उसे जेल भेज दिया। त्वरित न्यायालय प्रथम बिहारशरीफ (नालंदा) ने उसे एक साल की सजा सुनाई और 500 रुपए का अर्थ दंड भी लगाया। 500 रुपया अर्थ दंड नहीं देने की स्थिति में सात दिनों का अतिरिक्त कारावास भी उस महिला ने काटी। उक्त महिला, कारावास की सजा पूरी कर 22 जनवरी 2021 को जेल से बाहर निकलने वाली थी। नाम पता का सत्यापन नही होने के कारण महिला मंडल कारा बिहारशरीफ में ही पड़ी रही।

बांग्लादेशी महिला का पहचान पत्र।
अधिवक्ता ने आयोग को दी जानकारी
मामले की जानकारी जब मानवाधिकार मामलों के अधिवक्ता एस.के.झा को हुई, तब उन्होंने इस पूरे मामले की जानकारी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, नई दिल्ली एवं बिहार मानवाधिकार आयोग, पटना को दिए, तत्पश्चात आयोग ने अपने स्तर से जाँच शुरू कर दी। मानवाधिकार अधिवक्ता एस. के. झा के हस्तक्षेप के बाद 14 अगस्त 2021 को इस महिला को बिहार सुधारात्मक प्रशासनिक संस्थान हाजीपुर में स्थानांतरित कर दिया गया जहाँ पर वह महिला आज भी रह रही है ।अब सवाल उठता है कि आखिर पूरी प्रक्रिया पूरी होने के बाद, केस ट्रायल होने और सजा देने तक सरकार इस महिला के पते का सत्यापन नही करा सकी। अब महिला अपने घर जाने को इच्छुक है। लेकिन, कागजी प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण पेच फंस गया है। पुनः एक बार बिहार मानवाधिकार आयोग ने हस्तक्षेप करते हुए 29 अगस्त 2022 को अधिवक्ता एस. के. झा को अपना मंतव्य देने के लिए बुलाया है।





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