बिहार में छठ महापर्व की शुरुआत हो गई है। रोज की तुलना में लाखों की संख्या में लोग गंगा में आस्था की डुबकी लगाएंगे। लेकिन अधिकारियों और सिस्टम की लापरवाही के कारण बिहार में गंगा का पानी पीने और नहाने के योग्य नहीं बचा है।
साल दर साल यहां गंदगी का स्तर बढ़ते जा रहा है। गंगा को स्वच्छ और निर्मल करने के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। इसके बाद भी गंगा का पानी दूषित होता जा रहा है। इसका खुलासा विधानसभा में पेश CAG की रिपोर्ट में हुआ है।
रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में प्रदूषण के प्राथमिक स्रोत गंगा नदी के तट पर स्थित शहरों से वाहित मल, घरेलू अपशिष्ट जल का आना है। गंगा पर इसका असर यह हो रहा है कि इसका पानी पीने और नहाने के लिए उपयुक्त नहीं है। पूर्वी भारत में कोलकाता के बाद दूसरे सबसे बड़े शहरी क्षेत्र पटना में ड्रेनेज सिस्टम 200 साल पुराना है और अब यह बेहद खराब स्थिति में है।

684 करोड़ रुपए का नहीं हो सका इस्तेमाल
राजधानी पटना में सीवरेज इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए चार वित्त वर्ष में 684 करोड़ रुपए का इस्तेमाल करना था, लेकिन बिहार स्टेट गंगा रिवर कंजर्वेशन एंड प्रोग्राम मैनेजमेंट सोसायटी (बीजीसीएमएस) की ओर से इसका इस्तेमाल नहीं किया गया। काम की रफ्तार इतनी सुस्त है कि 2016-17 से 2019-20 के बीच केवल 16 से 50 फीसदी फंड का ही इस्तेमाल किया गया। इसका निर्माण करने वाली कंपनी बीजीसीएमएस के सेविंग अकाउंट में 683.10 करोड़ रुपए बेकार पड़े रहे।
4 साल में 1800 गुना दूषित हुआ गंगा का पानी
पानी किस तरह से दूषित हो रहा है इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि बिहार में सीवरेज इन्फ्रास्ट्रक्चर (पटना समेत) की कमी की वजह से 2016-17 में मेक्सिमम टोटल कोलीफॉर्म (टीसी) और फीकल कोलीफॉर्म (FC) का स्तर 9000 mpn/100 ml और 3100 mpn/100 ml से बढ़कर 2019-20 में बढ़कर 160,000 mpn/100 एमएल (TC और FC) हो गया।
यह बताता है कि किस तरह पानी की गुणवत्ता खराब हो रही है। सामान्य रूप से पीने के पानी में फीकल कॉलीफार्म की मात्रा शून्य होनी चाहिए। इसी तरह से पानी में टोटक कॉलीफार्म की मात्रा सामान्य रूप से 100 मिली में 10 से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।



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