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मिथिलाक्षर में लिखे जाएंगे मिथिलांचल के रेलवे स्टेशनों के नाम

संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल मैथिली भाषा एक और मुकाम हासिल करने जा रही है। मिथिलांचल में बीएसएनएल की कॉलर ट्यून मैथिली में सुनने के बाद अब यहां के स्टेशनों के नाम भी मैथिली में लिखने की मंजूरी मिल सकती है। संसद में एक सवाल के बाद रेलवे ने इस बारे में राज्य सरकार से सलाह की मांग की है। सरकार के गृह विभाग ने कोई सलाह देने से पहले मिथिलांचल के अधिकारियों से मंतव्य मांगा है। 

इसके बाद रेलवे को सरकार अपने जवाब से अवगत कराएगी। आने वाले दिनों में मधुबनी, दरभंगा, सीतामढ़ी, समस्तीपुर, बेगूसराय, जयनगर व झंझारपुर में रेलवे स्टेशनों के नाम मिथिलाक्षर में भी लिखे मिलेंगे। दरभंगा के सांसद गोपालजी ठाकुर ने इसकी मांग लोकसभा में की थी। इसके बाद रेलवे ने इस दिशा में पहल की है। रेलवे के जीएम ने इस बारे में राज्य सरकार से सलाह की मांग की है। 

रेलवे के पूर्व डिप्टी सीसीएम व वर्तमान में मुख्य जनसंपर्क अधिकारी बीरेंद्र कुमार ने गृह विभाग को पत्र लिखा है। गृह विभाग के विशेष सचिव विकास वैभव ने रेलवे की इस पहल पर मिथिलांचल में आने वाले प्रशासनिक अधिकारियों से मंतव्य की मांग की है। यदि अधिकारियों का मंतव्य मैथिली के पक्ष में जाता है तो जल्दी ही राज्य के छह स्टेशनों पर हिन्दी व अंग्रेजी के अलावा मिथिलाक्षर में भी नाम दिखाई पड़ेंगे।

पूर्व मध्य रेलवे के मुख्य जन संपर्क अधिकारी बीरेंद्र कुमार ने कहा, ‘संसद से मिले निर्देश के बाद गृह विभाग से मंतव्य की मांग की गई है। रेलवे के नियम के अनुसार किसी स्टेशन पर किस भाषा में स्टेशन का नाम प्रदर्शित होगा, इसके लिए राज्य सरकार की सहमति आवश्यक है। फिलहाल गृह विभाग की पहल का इंतजार है। इसके बाद मिथिलाक्षर को लेकर कदम उठाए जाएंगे।’

बीआरए बिहार विवि के मैथिली भाषा के गोल्ड मेडलिस्ट डॉ. कुमार राधारमण बताते हैं कि मैथिली भाषा 14 वीं शताब्दी यानी विद्यापति के समय से ही अस्तित्व में है। जब संस्कृत, पाली व प्राकृत भाषा का चलन था, उस समय मैथिली अपने शैशव अवस्था में थी। उन्होंने बताया कि मैथिली भाषा चंपारण से लेकर झारखंड के जामताड़ा तक बोली जाती है। हालांकि, मिथिलांचल में दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, समस्तीपुर, बेगूसराय खगड़िया, पूर्णिया व कटिहार तक माने जाते हैं। उन्होंने कहा कि हालांकि यह कठिन है, लेकिन मैथिली जिस प्रकार समृद्ध भाषा है और संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है, इसे सम्मान मिलना ही चाहिए।

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