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परिवार में लौटा ‘नूर : म’रा जानकर भूले, वकील दीदी की मदद से जेल से बाहर आया

घर वाले जिसे मरा समझ रहे थे वो चार साल बाद अपने घर लौटा तो परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। यह कहानी है बंगाल के मुर्शिदाबाद के रहने वाले नूर मोहम्मद की। वह चार साल से मुजफ्फरपुर के सेंट्रल जेल में बंद था। एक महिला वकील की मदद से अब वह अपने घर पहुंचा है।

लिपटकर रोने लगे बच्चे

जब मंगलवार शाम नूर सेंट्रल जेल से बाहर निकला तो उसके बेटे जलील और दोनो बेटियां पिता से लिपट कर रोने लगी। उसे जेल से निकालने और परिवार वालों से मिलाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली अधिवक्ता होमा परवीन भी वहीं पर मौजूद थी। जब मेल-मिलाओ समाप्त हुआ तो जलील ने हाथ जोड़कर अधिवक्ता से कहा वकील दीदी धन्यवाद! हमने तो उम्मीद हो छोड़ दी थी।

पत्नी ने वियोग में तोड़ा था दम

पिता को मरा हुआ समझ रहे थे। इसी वियोग में मां ने भी पिता के लापता होने के दो साल बाद यानी 2019 में दम तोड़ दिया था। जलील कहते हैं, काश! आज मां जिंदा होती। वह खुशी से झूम उठती। ज़लील और उसके परिवार के लोग बार-बार अधिवक्ता को धन्यवाद कह रहे थे। उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे। ज़लील कहते हैं, वकील दीदी ने उन लोगों की जिंदगी में एक बार फिर से खुशियां ला दी है। उनका आभार हम कभी नहीं भूलेंगे।

घर जाकर भोज करेंगे

बता दें कि कोर्ट से जमानत मिलने के बाद देर शाम नूर जेल से बाहर निकले। अब परिजन उन्हें घर ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। जलील ने कहा कि पिता के जीवित होने और घर लौटने की खुशी में वहां जाकर भोज करेंगे। इसमें सभी अपनों को बुलाएंगे और उन्हें वकील दीदी के बारे में बताएंगे। पिता के जीवित होने की जानकारी रिश्तेदारों और परिचित को दे दी है। सभी लोग उनसे मिलने आ रहे हैं।

समय तो लगा, पर अंत बहुत सुखद

अधिवक्ता होमा परवीन ने बताया कि जब उन्हें ये जिम्मेदारी सौंपी गई थी तो उस समय केस देखकर लगा कि काम बहुत मुश्किल है। फिर जब नूर से जेल में मिलने गयी और उससे बात की तब तो और भी परेशान हो गयी थी। सबसे बड़ी समस्या भाषा की थी। नूर से दो घंटे बात हुई। पर उसकी भाषा समझ नही सकी। कुछ तो डायरी में लिखा और कुछ बात तो बिल्कुल भी नहीं समझ पाई। एक समय तो हिम्मत टूटने लगी थी। लेकिन, ऊपर वाले का शुक्रिया। उन्होंने मुझमें हिम्मत दी। इसके बाद धीरे-धीरे कर नूर के घर का पता खोजने में सफलता मिल ही गयी। तीन महीने तक न तो ठीक से सो पाई और न खाना खा पाई। इन तीन महीनों की कठिन परिश्रम का फल और अंत काफी सुखद रहा। जब नूर अपने परिवार वालों से मिला तो उन्हें सुकून मिल गया। आखिरकार मेरी मेहनत रंग लाई।

नूर की भावना से समझी

नूर जब जेल से निकले और अपने परिवार से मिले तो उनकी आंखों में भी खुशी के आंसू आ बेटे-बेटियों से लिपटकर खूब रोए। फिर उनके बेटे ने अधिवक्ता की तरफ इशारा करते हुए बंगाली भाषा मे कुछ कहा। इसके बाद नूर ने हाथ जोड़कर अधिवक्ता को बंगाली भाषा मे धन्यवाद कहा। और भी उसने कुछ कहा। वह भाषा तो नहीं समझ पाई। लेकिन, उसकी भावना को अवश्य समझ गईं।

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