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देशभर में प्रसिद्ध है मुजफ्फरपुर में स्थित मां राज राजेश्वरी देवी मंदिर, दर्शन करने वालों की पूरी होती है सारी मुरादें

मुजफ्फरपुर। क्लब रोड रमना स्थित प्रसिद्ध राज राजेश्वरी देवी मंदिर की गिनती उत्तर बिहार के प्रमुख शक्तिपीठों में की जाती है। यहां सालों भर भक्तों का तांता लगा रहता है। दूर-दूर से लोग श्रद्धा के साथ अपनी मुरादें लेकर आते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में स्थापित माता हर व्यक्ति की मुरादें पूरी करती हैं। माता सिंदूर व दूब से पूजा करने पर खुश होती हैं।

मां के आशीर्वाद

से पुत्र रत्‍‌न

कहते हैं कि मंदिर की स्थापन

धर्मानुरागी उमाशंकर प्रसाद उर्फ बच्चा बाबू ने की थी। मंदिर निर्माण से पूर्व उन्हें पांच बेटियां ही थीं, बेटा नहीं हो रहा था। तब उन्हें बताया गया कि माता षोडशी भक्तों की मनोकामना पूरी करती हैं। इससे उन्हें माता का मंदिर बनवाने की प्रेरणा मिली। उन्होंने जयनगर, नेपाल के पंडित नृशन मिश्रा से संपर्क किया। उनके निर्देशानुसार शुभ घड़ी में माता राज राजेश्वरी देवी मंदिर की स्थापना हुई। इसके कुछ ही महीने बाद बच्चा बाबू को पुत्र की प्राप्ति हुई। इसके बाद से ही मंदिर के प्रति लोगों की आस्था बढ़ गई। मंदिर को आमजन के लिए खोल दिया गया।

इतिहास

बताते हैं कि मंदिर की स्थापना 28 जून 1941, आषाढ़ शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि को की गई थी। समय-दर-समय मंदिर की कीर्ति बढ़ती ही जा रही है। यहां दूर-दूर से लोग पहुंच रहे हैं। कहा जाता है कि यह मंदिर बच्चा बाबू के पुत्र अमिताभ मेहरोत्रा की निजी संपत्ति है। इसमें किसी खास तरह का चढ़ावा या कोई कीमती सामान चढ़ाने की अनुमति किसी को नहीं है।

विशेषता

मंदिर में मां आदिशक्ति के षोडशी स्वरूप की प्रतिमा स्थापित है। इसकी गिनती दस महाविद्या में होती है। कहा जाता है कि महर्षि दुर्वासा ने भी माता के इस स्वरूप की आराधना की थी। मंदिर में स्थापित माता के सोने की प्रतिमा के दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। बताते हैं कि अभी तक ऐसे कई दृष्टांत हुए जिससे मां के प्रति लोगों की आस्था बढ़ती चली गई। कहते हैं कि यहां आने वाले लोग कभी खाली हाथ नहीं लौटते। मां के दर्शन से सारे संताप दूर हो जाते हैं।

रूट

स्टेशन पहुंचने के बाद उत्तरी द्वार से बाहर निकलकर मेन रोड से पूरब की तरफ सीधा बढ़ना है। करीब डेढ़ किमी आगे बढ़ने पर मोतीझील व कल्याणी चौक होते हुए हरिसभा चौक जाना है। वहां से चंद कदम आगे दाएं तरफ मंदिर है।

वास्तुकला

मंदिर का निर्माण वास्तुकला के हिसाब से किया गया है। चाहे देव-प्रतिमाओं की स्थापना हो या परिक्रमा स्थल व गर्भ-गृह का निर्माण, वास्तुकला का ख्याल रखा गया है।

बयान

वैसे तो यहां सालों भर लोगों का आना लगा रहता है, मगर नवरात्र के अवसर पर यहां लाखों की भीड़ उमड़ती है। सुबह-शाम दोनों समय माता की भव्य आरती होती है जिसमें काफी लोग भाग लेते हैं। अष्टमी से दशमी तक तो यहां कदम रखने की भी जगह नहीं होती। साल दर साल यहां श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती ही जा रही है।

– डॉ.धर्मेद्र तिवारी, प्रधान पुजारी

मंदिर में सुबह से लेकर शाम तक सालों भर भक्तों का तांता लगा रहा है। मां के प्रति लोगों की गहरी आस्था है। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने नित्य मां के दर्शन का नियम बना रखा है। चाहे कैसा भी मौसम क्यों न हो, वे मां के दरबार में आते ही हैं।

– पं.कामेश्वर त्रिपाठी, पुजारी

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