निर्भया गैं’गरे’प केस में मौ’त की सजा पाये दोषि’यों को फां’सी दिये जाने के लिये सात दिन की समय सीमा निर्धारित करने का अनु’रोध करते हुये केन्द्र ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की। दिसंबर, 2012 के निर्भया सामूहिक बला’त्कार और ह’त्या मा’मले में दो’षियों द्वारा पुनर्विचार याचिका, सुधारात्मक याचिका और द’या याचिकाएं दायर करने की वजह से मौ’त की स’जा के फैसले पर अमल में विलंब के मद्देनजर गृह मंत्रालय की यह याचिका काफी महत्वपूर्ण है।सरकार ने जोर देते हुए कहा कि समय की जरूरत है कि दो’षियों के मानवाधिकारों को दिमाग में रखकर काम करने के बजाय पीड़ि’तों के हित में दिशानिर्देश तय किये जाएं।

गृह मंत्रालय ने एक आवेदन में कहा है कि शीर्ष अदालत को सभी सक्षम अदालतों, राज्य सरकारों और जे’ल प्राधिकारियों के लिये यह अनिवार्य करना चाहिये कि ऐसे दो’षी की दया याचिका अस्वीकृत होने के सात दिन के भीतर सजा पर अमल का वा’रंट जारी करें और उसके बाद सात दिन के अंदर मौ’त की स’जा दी जाए, चाहे दूसरे सह-मुजरिमों की पुनर्विचार याचिका, सुधारात्मक याचिका या दया याचिका लंबित ही क्यों नहीं हों। मंत्रालय ने कहा, ‘दु’ष्कर्म का अपराध न केवल देश की दं’ड संहिता में परिभाषित दं”डनीय अ’पराध है बल्कि किसी भी सभ्य समाज में यह सबसे भ’यावह और अक्षम्य अ’पराध है। ब’लात्कार का जु’र्म न केवल किसी व्यक्ति और समाज के खि’लाफ अप’राध है बल्कि पूरी मानवता के खि’लाफ है।’ इसमें कहा गया, ‘इस तरह के दु’ष्कर्म के ज’घन्य और भ’यावह अ’पराधों के अनेक मा’मले हैं जिनमें पी’ड़ितों की उतनी ही भ’यावह ह’त्या के अ’पराध को भी अं’जाम दिया गया और जिन्होंने देश की सामूहिक अंतरात्मा को झ’कझोर दिया।’

पहले के दिशा-निर्देशों में हों बदलाव
सरकार ने कहा कि जनता और पीड़ि’तों एवं उनके परिवारों के व्यापक हित में पहले के दिशानिर्देशों में बदलाव होना चाहिए ताकि इस तरह के भया’वह, ज’घन्य, दु’र्दांत, क्रू’र, घृ’णित तथा नृ’शंस अप’राधों के आ’रोपियों को कानून की ग’रिमा से खेलने की तथा उन्हें सुनाई गयी कानून सम्मत स’जा पर अमल को लं’बित करने की अनुमति नहीं दी जाए। सालिसिटर जनरल तुषार मेहता के माध्यम से दाखिल याचिका में गृह मंत्रालय ने अदालत से समयावधि निश्चित करने का अ’नुरोध किया जिसमें मौ’त की स’जा सुनाये जाने के बाद दो’षी को सुधारात्मक याचिका दाखिल करनी हो तो वह उसी के भीतर करे।मंत्रालय ने कहा कि अपराध न्याय प्रणाली के तहत आ’रोपियों को न्यायिक प’ड़ताल के विभिन्न स्तरों पर पुख्ता व्यवस्था मुहैया कराई जाती है ताकि किसी मुजरिम को कानून के अनुरूप सख्त स’जा दी जा सके और दो’षियों को न्यायिक प्रक्रियाओं का दुरुपयोग नहीं करने दिया जाए।शत्रुघन चौहान मामले में 2014 में जारी निर्देशों में बदलाव की मांग करते हुए गृह मंत्रालय ने कहा, ”सभी दिशानिर्देश मुल्जिम केंद्रित हैं। हालांकि इन दिशानिर्देशों में पीड़ितों और उनके परिजनों के अपूरणीय मानसिक सदमे, यातना, खलबली को, देश की सामूहिक अंतरात्मा को तथा मृत्यु दंड से होने वाले अपराध की रोकथाम के प्रभाव को ध्यान में नहीं रखा जाता। पता चला कि 2014 के फैसले के कई साल पहले से और बाद तक इस तरह के जघन्य अपराधों के दोषी अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) की आड़ में न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करते हैं।
अब 1 फरवरी को होगी फां’सी
शीर्ष अदालत ने निर्भया मा’मले में मौ’त की स’जा पाये एक दो’षी पवन की नयी याचिका 20 जनवरी को खारिज कर दी थी। इस याचिका में दो’षी ने दावा किया था कि अप’राध के समय 2012 में वह नाबालिग था। दिल्ली की अदालत ने हा”ल ही में इस मामले के दोषियों-विनय शर्मा, अक्षय कुमार सिंह, मुकेश कुमार सिंह और पवन- को एक फरवरी को फां’सी के फं’दे पर लटकाने के लिये वा’रंट जारी किया है। इससे पहले इन दो’षियों को 22 जनवरी को फांसी दी जानी थी लेकिन लंबित याचिकाओं की वजह से ऐसा नहीं हो सका था।

केंद्र की कोर्ट से तीन गुहार
मंत्रालय ने तीन प्रार्थनाएं की हैं जिनमें न्यायालय से यह निर्देश जारी करने का भी अ’नुरोध किया गया है कि मौ’त की स’जा पाने वाले मुजरिमों की पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद सुधारात्मक याचिका दायर करने की समय सीमा निर्धारित की जाये। मंत्रालय ने यह निर्देश देने का भी अनुरोध किया है कि अगर मौ’त की स’जा पाने वाला मुजरिम दया याचिका दायर करना चाहता है तो उसके लिये फां’सी दिये जाने संबंधी अदालत का वा’रंट मिलने की तारीख से सात दिन के भीतर दायर करना अनिवार्य किया जाये। गृह मंत्रालय ने कहा कि देश आ’तंकवाद, बला’त्कार और ह’त्या जैसे कुछ अ’पराधों का सामना करता रहता है जिनमें मौ’त की सजा का प्रावधान है।
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