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जिन घरों में खिड़की नहीं-ऊंचाई कम, वहां के बच्चों को ग्रीन हाउस इफेक्ट से हो रहा AES

बिहार में मुजफ्फरपुर समेत 14 जिलों में कहर बरपाने वाली Acute Encephalitis Syndrome (AES) की एक बड़ी वजह लाेगाें के घर बनाने में खामियां और इससे तापमान बढ़ना है। इससे बचाव के लिए शोध कर रही AIIMS जोधपुर की टीम ने प्रभावित इलाकों के घरों का तापमान सामान्य से 3-4 डिग्री तक अधिक पाया है। इससे बच्चों का माइटोकॉन्ड्रिया (मानव शरीर में ऊर्जा केंद्र) क्षतिग्रस्त हो जाता है। मुजफ्फरपुर के अत्यधिक AES प्रभावित 3 प्रखंडों मुशहरी, मीनापुर और बोचहां में एम्स जोधपुर की शोध टीम के अध्ययन से यह खुलासा हुआ है।

रिपोर्ट शनिवार काे ICMR काे सौंप दी गई। इस अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर तीनों प्रखंडों के 30-30 यानी 90 नए घरों में सेंसर लगेगा। जनवरी में सेंसर लगाने के लिए IIT कानपुर काे ऑर्डर दे दिया गया है। सेंसर गर्मी, हवा, नमी और अन्य आंकड़े जुटाता है। इसकी मॉनीटरिंग जोधपुर एम्स से होती है। अंतिम रिपोर्ट अगले साल जुलाई या अगस्त में सौंपी जाएगी।

अरुण सिंह, टीम अध्यक्ष, जोधपुर एम्स

अरुण सिंह, टीम अध्यक्ष, जोधपुर एम्स

ट्रैप द सनराइज : ग्रीन हाउस इफेक्ट जैसे बढ़ाता है तापमान

प्रभावित इलाके के 150 घरों में हीट सेंसर की रिपोर्ट के अनुसार, घरों की ऊंचाई 6 से 8 फीट तक ही है। इनमें खिड़कियां भी नहीं हैं। इसलिए दिन और रात में भी बाहर के सामान्य तापमान से घर में 3 से 4 डिग्री तक टेम्प्रेचर अधिक हाे जाता है। दिन में जो गर्मी होती है, वह गैस ग्रीन हाउस इफेक्ट की तरह रात तक नहीं निकल पाती है। यह गैस गर्मी को ट्रैप कर लेती है। इसे ट्रैप द सनराइज कहा जाता है। लिहाजा कमरे का तापमान 4 डिग्री तक बढ़ जाता है। माइटोकॉन्ड्रिया प्रभावित हाेने से बच्चे चमकी-बुखार से ग्रसित हो जाते हैं।

बायोप्सी टेस्ट में माइटोकॉन्ड्रिया क्षतिग्रस्त होने की हुई थी पुष्टि

AES पीड़ित बच्चों के 2019 में बायोप्सी टेस्ट में माइटोकॉन्ड्रिया डैमेज होने की पुष्टि हुई थी। इससे ग्लूकोस लेवल अचानक काफी कम हो जाता है। यह पता करने के लिए एसकेएमसीएच में भर्ती 5 बच्चों के सेल सैंपल की जांच बेंगलुरू में हुई थी। उसी रिपोर्ट के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने जोधपुर एम्स के नवजात शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ अरुण कुमार सिंह के नेतृत्व में शोध टीम बनाई। बीते 10 साल में AES और चमकी-बुखार के कारण मुजफ्फरपुर में करीब 500 व राज्य में डेढ़ हजार से अधिक बच्चों की जान जा चुकी है।

मुजफ्फरपुर में 1992 में मिला था पहला मामला

  • 1992 में आया था मुजफ्फरपुर जिले में AES का पहला केस। उसके बाद यह 14 जिलों में पांव पसार चुकी है।
  • 150 से अधिक बच्चे की मौत हुई थी पहले साल ही। 1992 से अब तक बिहार के 1500 बच्चों की मौत हो चुकी है।
  • 10 वर्षों में करीब 500 मौतें हुई है सिर्फ मुजफ्फरपुर जिले में। वहीं करीब 2000 बच्चे इस बीमारी से ग्रसित हुए हैं।

(जैसा कि डॉ. सिंह ने भास्कर संवाददाता धनंजय मिश्र काे रविवार काे बताया)

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