औरंगाबाद का देवार्क सूर्य मंदिर या देव सूर्य मंदिर लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है। यह भगवान सूर्य को समर्पित 12 प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। पत्थरों को तराश कर बनाया गया यह मंदिर अपनी अनूठी शिल्प कला के लिए जाना जाता है। वैसे तो यहां हर रविवार श्रद्धालु पूजा करने और भगवान सूर्य को अर्घ्य देने आते हैं, लेकिन छठ के मौके पर यहां व्रतियों की भीड़ बहुत ज्यादा होती है।
बिहार ही नहीं, देश-विदेश से श्रद्धालु यहां छठ का अनुष्ठान करने आते हैं। यहां उगते सूर्य को अर्घ्य देकर छठ व्रत के समापन का बहुत ज्यादा महत्त्व माना जाता है। मान्यता है कि लोग यहां मुरादें मांगते हैं और उनके पूरे हो जाने पर दुबारा भी आते हैं।


इतिहासकार इसके बनने का समय छठी-आठवीं शताब्दी के बीच, जबकि पौराणिक कथाएं और मान्यताएं इसे त्रेता और द्वापरयुग के बीच के समय में बना बताती हैं।
मगध में मौजूद पांच सूर्य मंदिरों में है एक
मान्यताओं के अनुसार, ऐसे 12 मंदिरों की स्थापना भगवान श्रीकृष्ण और उनकी एक पटरानी जांबवंती के पुत्र साम्ब ने की थी। ऐसा उन्होंने एक श्राप से छुटकारा पाने के लिए किया था। इन कहानियों के आधार पर पुरातत्ववेताओं ने खोज की तो 11 मंदिर ही मिले। इनमें से पांच मंदिर तो मगध क्षेत्र में ही हैं। इनके नाम हैं- नालंदा जिले मे बड़गांव का सूर्य मंदिर (बड़ार्क), ओंगरी का सूर्य मंदिर (ओंगार्क), औरंगाबाद जिले में देव का सूर्य मंदिर (देवार्क), पटना जिले के पालीगंज में उलार का सूर्य मंदिर (उलार्क) और बाढ़ में पंडारक का सूर्य मंदिर (पुण्यार्क)।

औरंगजेब की वजह से मंदिर का मुख पश्चिम दिशा में होने की कहानी है प्रचलित
मंदिर को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं। कहा जाता है कि भगवान विश्वकर्मा ने एक ही रात में इस मंदिर का निर्माण कराया था। एक कहानी यह भी है कि मुगल शासक औरंगजेब यहां आया था और मंदिर को तोड़ने की बात कही थी। आसपास के लोगों और पुजारियों की गुहार पर औरंगजेब ने कहा कि अगर इस मंदिर का मुख्य गेट एक रात में पूर्व से पश्चिम हो जाए तो वह इसे नहीं तोड़ेगा। पुजारियों ने रात में भगवान सूर्य की खूब पूजा-अर्चना की। जब सुबह आकर देखा तो इस मंदिर का मुख्य गेट पूर्व से पश्चिम हो गया था।
हालांकि, वर्तमान में मंदिर के मुख्य पुजारी सच्चिदानंद पाठक ने कहा कि यह सिर्फ दंतकथा है। भगवान सूर्य की प्रतिमा पश्चिम की ओर इसलिए है कि हिंदू धर्म में पूर्व की ओर मुख करके भगवान की पूजा-अर्चना करते हैं।

मंदिर के गर्भगृह में भगवान सूर्य के ही तीन रूपों की मान्यता वाले ब्रह्मा, विष्णु और महेश त्रिदेव के रूप में विराजमान हैं।

छठी-आठवीं शताब्दी में बना, गर्भगृह में हैं त्रिदेव
मंदिर के बाहर पाली लिपि में लिखित अभिलेख है, जिसके आधार पर पुरातत्व विभाग और इतिहासकार इसके बनने का समय छठी-आठवीं शताब्दी के बीच बताते हैं। जबकि पौराणिक कथाएं और मान्यताएं इसे त्रेता और द्वापरयुग के बीच के समय में बना बताती हैं। मंदिर के गर्भगृह में भगवान सूर्य के ही तीन रूपों की मान्यता वाले ब्रह्मा, विष्णु और महेश त्रिदेव के रूप में विराजमान हैं। गर्भगृह के मुख्य द्वार पर बाईं ओर भगवान सूर्य की प्रतिमा है। भगवान सूर्य की ऐसी प्रतिमा अन्य मंदिरों में देखने को नहीं मिलती है।



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