जिला स्कूल गया के छात्रों व उसके एक शिक्षक की झोली में बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। उपलब्धि भी ऐसी कि वह देश भर अकेली है। यह उपलब्धि देश के अन्य स्कूलों को हासिल नहीं हुई है। देश भर के 300 स्कूलों में उसने पहला स्थान प्राप्त किया है। यह सफलता उसे खुली हवा की नमी से पानी बनाने में मिली है। स्कूल के छात्रों द्वारा बनाए गए एयर वाटर जनरेटर प्रोजेक्ट को भारत सरकार ने पेटेंट कराया है।
कंट्रोलर जनरल ऑफ पेटेंट डिजाइन व ट्रेडमार्क ने जिला स्कूल गया को इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइटस का सटिर्फिकेट जारी कर दिया है। वहीं नीति आयोग ने इस प्रोजेक्ट को मार्केट में लाने की जिम्मेदारी डेल व लर्निंग लिंक्स फाउंडेशन को दी है। इस पेटेंट में एटीएल इंचार्ज डॉ देवेंद्र सिंह, स्टूडेंट प्रेम सागर, प्रीतम कुमार, व श्रेया सिन्हा एप्लिकेंट व इन्वोटर है। अब चारों के बीच बांड भरा जाना बाकी है। जिला स्कूल के साइंस टीचर देवेंद्र सिंह के नेतृत्व में अटल टिकरिंग लैब के स्टूडेंट द्वारा वाटर कंजर्वेशन प्रोजेक्ट तैयार किया गया था। जिसे भारत सरकार द्वारा मंजूरी दी गई है।



इस प्रोजेक्ट का नाम एयर वाटर जनरेटर है। एयर वाटर जनरेटर के माध्यम से हवा की नमी से पानी बनाया जाएगा जो कि सौ प्रतिशत शुद्ध व एनर्जी युक्त होगा। खास बात यह है कि देश भर से चयनित सात एटीएल स्कूलों ने अपने-अपने प्रोजेक्ट के पेटेंट के लिए आवेदन किया था। कई राउंड की टेस्टिंग के बाद कंट्रोलर ऑफ पेटेंट ने जिला स्कूल गया के इस प्रोजेक्ट को स्वीकृति दी है। इस प्रोजेक्ट के माध्यम से गया जैसे ड्राई जोन क्षेत्र में पेयजल की आपूर्ति की सुविधा कम खर्च में ही उपलब्ध होगी सकेगी।

पहाड़ी क्षेत्रों के साथ-साथ वैसे इलाकों में यह मशीन काफी उपयोगी साबित होगी जहां का पानी किसी न किसी वजह से दूषित है। यह मशीन दिन भर में दस से 15 लीटर हवा की नमी से पानी बनाने की क्षमता रखता है जो किसी भी एक परिवार के लिए पीन के लिए पर्याप्त है।देश भर में पहला स्थानजिला स्कूल गया के अटल टिकरिंग लैब के लैब इंचार्ज डॉ देवेंद्र सिंह ने बताया कि एटीएल मैराथन प्रतियोगिता में यह प्रोजेक्ट पूरे भारत में 300 में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। टॉप 100, टॉप 50 व टॉप 8 में भी प्रथम स्थान रहा। यही वजह रही कि 14 नवंबर 2019 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद सम्मानित-पुरस्कृत प्रोजेक्ट पर स्कूल के बच्चों ने 2018 में काम करना शुरू कर दिया था। जो 2019 में वजूद में आ गया था जो तमाम पड़ाव व सफर और परीक्षण के बाद आज पेटेंट तक पहुंचा है।




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