बिहार में इस बार कड़ाके की ठंड पड़ने के आसार हैं। मानसून की देर से हुई विदाई की वजह से सूबे में भले ही सर्दी देरी से दस्तक देगी, लेकिन इसका असर लंबे दिनों तक दिखेगा। माना यह जा रहा है कि दिसंबर की अपेक्षा इस बार जनवरी और फरवरी के महीने में सूबे में कोल्ड डे और कोल्ड नाइट की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा होगी
शीतलहर की अधिकता रहेगी। अधिक दिनों तक सामान्य से नीचे पारा रह सकता है। इसका आरंभ दिसंबर के मध्य से विशेष रूप से दिखने लगेगा। मौसमविदों के अनुसार ला नीना के प्रभाव से उत्तर पूर्व एशिया में संभावित मौसमी बदलावों का असर बिहार सहित देश के कई राज्यों में दिखेगा।
उत्तर भारत में पारा तीन डिग्री सेल्सियस तक आने का अनुमान किया जा रहा है। बिहार के साथ-साथ पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी इसका व्यापक असर दिखेगा। यानी इस बार सूबे में ठिठुरन भरी ठंड का रिकॉर्ड टूट सकता है। मौसमविदों का कहना है कि प्रशांत महासागर क्षेत्र में संभावित बदलावों को देखते हुए मौसम को लेकर अभी ऐसा अनुमान किया जा रहा है।
आमतौर पर इसके असर के रूप में यह देखा जाता है कि इसके प्रभाव से उत्तरी गोलार्ध में तापमान सामान्य से कम रहता है। इसके प्रभाव से इस बार भी उत्तर पूर्व एशिया में ठंड की ठिठुरन इस बार असरदार होने वाली है।


2017 में सूबे में भारी ठंड की स्थिति बनी थी
मौसमविदों की मानें तो 2017 में भी इन्हीं प्रभावों से सूबे में कड़ाके की ठंड पड़ी थी तब पटना का न्यूनतम पारा चार डिग्री तक पहुंच गया था। गया में तापमान तीन डिग्री के आसपास आ गया था। कोल्ड वेव की वजह से जनजीवन पर भारी असर पड़ा था।

गेहूं सहित रबी फसलों के लिए बेहतर होंगी परिस्थितियां
विशेषज्ञ बताते हैं कि देर तक ठंड के प्रभावी रहने से इसका असर सूबे में खेती पर भी पड़ेगा। शीतकालीन फसलों की पैदावार प्रभावित होगी। साथ ही सब्जियों के उत्पादन पर भी इसका असर पड़ेगा। बिहार सरकार के कृषि विभाग के उपनिदेशक अनिल कुमार झा का कहना है कि यह गेहूं सहित अन्य रबी फसलों के लिहाज से बेहतर परिस्थितियां होगी। लंबे दिनों तक ठंड रहने से गेहूं की पैदावार अच्छी होगी। मक्के के लिए भी यह फायदेमंद हैं, लेकिन अगर मक्के में फूल आने के समय तापमान सामान्य से काफी नीचे रहता है तो दाने बनने में समस्या होगा

सांस के रोगियों को बरतनी होगी विशेष सतर्कता
ज्यादा ठंड या शीतलहर की स्थिति में सांस के रोगियों को एहतियात बरतने की जरूरत होगी। एम्स पटना के सीनियर फीजिशियन डॉ. रवि कीर्ति कहते हैं कि इन परिस्थतियों में दमा के मरीजों को विशेष ध्यान देने की जरूरत है। ठंड के दिनों में लोगों का अमूमन बाहर कम निकलना होता है। ऐसे में मोटापा और मोटापाजनित बीमारियां बढ़ेंगी। खानपान बेहतर रखना होगा। फलों और हरी सब्जियों का भरपूर सेवन करना होगा। जाड़े में जब भी धूप निकले तो कुछ देर के लिए धूप सेंकना जरूरी होगा।
क्या है ला नीना
यह प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक घटना (तूफान) है। स्पैनिश भाषा में ला नीना का मतलब होता है नन्ही बच्ची। ला नीना को कभी-कभी एल विएजो या एंटी-एल नीनो भी कहा जाता है।




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