इस वर्ष जून से अक्टूबर तक बागानों में जलजमाव से विश्व विख्यात शाही लीची के साथ आम, अमरूद के पेड़ सूखने लगे हैं। इससे जिले में अगले सीजन में लीची के उत्पादन में भारी कमी हाेने की आशंका है। बाेचहां प्रखंड के झपहां समेत कुछ क्षेत्र में चार माह जलजमाव के बाद अब सूख रहे बाग देख किसान परेशान हैं।
जलजमाव से खासकर 5 से 25 वर्ष तक के नए पेड़ अधिक सूख रहे हैं। जिले में इस महीने 4 अक्टूबर तक 182 एमएम के बाद 18 व 19 अक्टूबर काे 22 एमएम बारिश हुई है। जिले में 11 हजार हेक्टेयर में लीची व 14 हजार हेक्टेयर में आम के बागान हैं।


लीची व्यापारी सहदेव कुमार ने बताया, वैज्ञानिक बागान काे बचाने के लिए पेड़ाें की जड़ में दवा डालने की सलाह दे रहे हैं, लेकिन जलजमाव से यह संभव नहीं है। लीची उत्पादकों काे इस वर्ष कोरोना के कारण पहले ही घाटा हुआ है। लॉकडाउन में बाहर से व्यापारी नहीं आए। आंधी-बारिश से भी फलों को नुकसान पहुंचा।

झपहां बाजार के उत्तर 1000 हेक्टेयर में जलजमाव
झपहां बाजार के उत्तर 1000 हेक्टेयर में जलजमाव है। पिछले वर्ष भी आसपास के बागान में पेड़ सूख गए थे। भाेलानाथ झा, राम किशोर प्रसाद, रामसागर ठाकुर, विनोद चौरसिया आदि के बागान सूख रहे हैं। किसान झा ने बताया, एनएच-77 बनने से पहले स्लुइस गेट से झपहां मन में पानी निकल जाता था, लेकिन उसे बंद करने से नुकसान हाे रहा है। जिले में लीची का 100 कराेड़ तक का व्यापार हाेता रहा है।
- उद्यान निदेशक काे पत्र लिखकर पानी निकासी की व्यवस्था करने का आग्रह कर रहे हैं। किसान बागान से पानी निकलने पर जुताई करें। इसके बाद जड़ में प्रति पाैधा 50 ग्राम ट्राइकोडर्मा डालें। – डॉ. एसडी पाण्डेय, निदेशक, राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र




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