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मुजफ्फरपुर: टोक्यो पैरालिंपिक में कांस्य पदक जीतने के बाद शरद के पैतृक गांव में जश्न, पिता बोले- बेटे ने देश का मान बढ़ाया

कहते हैं मन में अगर जज्बा हो, कुछ कर गुजरने की तमन्ना हो तो कोई भी काम मुश्किल नहीं है। ये बात सटीक बैठती है मुफ्फरपुर के शरद कुमार पर, जिन्होंने टोक्यो पैरालिंपिक में कांस्य जीतकर देश का मान बढ़ाया है। जीत के बाद उनके पैतृक गांव मोतीपुर कोडरकट्टा के पूरन में लोग देर शाम से ही जश्न में डूब गए हैं। मिठाइयां बांटी जा रही है। आज मुजफ्फरपुर के लोग गर्व से फूले नहीं समा रहे हैं।

ग्रामीण बताते हैं- “शरद के माता-पिता अब गांव में नहीं रहते हैं। पहले शहर में नीम चौक पर किराए का कमरा लेकर रहते थे। कुछ-कुछ दिनों पर गांव आते थे। लोगों से मिलना होता था। इसके बाद पटना शिफ्ट कर गए। इधर, काफी दिनों से गांव नहीं आए हैं।

18 माह में हुआ था पोलियो

शरद के पिता सुरेंद्र कुमार ने बताया- “18 माह की उम्र में उसे बाएं पैर में पोलियो हो गया था।’ पिता किसान हैं। उनकी माता कुमकुम देवी गृहिणी हैं। शरद के बड़े भाई शलज कुमार सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं। शरद जब पैर से दिव्यांग हो गए तो माता-पिता को चिंता सताने लगी थी। कुछ दिनों बाद प्रारम्भिक पढ़ाई के लिए दार्जिलिंग भेज दिया गया।

देर रात एक-दूसरे को मिठाई खिलाते ग्रामीण।

देर रात एक-दूसरे को मिठाई खिलाते ग्रामीण।

लंगड़ा कहकर चिढ़ाते थे बच्चे

पिता कहते हैं- “बचपन में शरद को चलता देख बच्चे उसे चिढ़ाते थे। हमसे कहते थे आपका बेटा लंगड़ा हो गया। यह सुनकर शरद और हमें खराब लगता था। हम लोग उसे हौसला देते थे। कहते थे मेहनत करो। सफलता जरूर मिलेगी। ऊपर वाले पर भरोसा रखो।’

एशियन गेम्स में जीता था गोल्ड मेडल

शरद एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल और एक बार लंदन वर्ल्ड चैंपियनशिप में रजत पदक जीत चुके हैं। पटना में 2017 में राज्य खेल सम्मान में बिहार सरकार की तरफ से पुरस्कृत भी किया जा चुका है। स्पेशल ओलिंपिक बिहार के स्पोर्ट्स डायरेक्टर और PEFI बिहार चैप्टर के सचिव कुमार आदित्य ने बताया- “शरद से कई बार मिल चुके हैं। वह काफी लगनशील है। एक बार जिस काम को ठान लेता है उसे पूरा किए बिना नहीं छोड़ता। इसी जिद ने उसे आज इस मुकाम पर पहुंचाया है।’

क्रिकेट खेलने के थे शौकीन

बताया जाता है कि दार्जिलिंग में स्कूलिंग के दौरान दोस्तों को क्रिकेट खेलते देख उन्हें भी बहुत मन होता थे। वे खेलते भी थे। क्रिकेट खेलने का शौक हो गया। इसी दौरान कुछ लड़कों को हाई जम्प करते देखा। फिर उन्होंने भी हाई जम्प लगाना शुरू कर दिया।

1.30 मीटर लगाया हाई जम्प

स्कूल में उन्होंने 1.30 मीटर हाई जम्प लगाया। इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया। इस दौरान अपनी प्रतिभा को दबने नहीं दिया। कॉलेज में भी हाई जम्प में नए-नए कीर्तिमान स्थापित करते गए। वहां से फिर JNU में MA की पढ़ाई करने गए। इसी दौरान एशियन गेम्स जीता था। शरद ने भारतीय खेल प्राधिकरण (साईं) में ट्रेनिंग ली है। वे ट्रेनिंग करने कई बार विदेश भी जा चुके हैं।

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