मधुबनी,। सिक्की घास से बने जूते-चप्पल अब पैरों की शोभा बढ़ाएंगे। ये सेहत का भी ख्याल रखेंगे। तीन महीने पहले बनने की शुरुआत होने के साथ ही देश के अलग-अलग शहरों से 600 जोड़ी जूते-चप्पलों के आर्डर मिले हैं। इसकी सैंपलिंग से लेकर पेमेंट तक ऑनलाइन माध्यम से हो रहा है। झंझारपुर प्रखंड के रैयाम निवासी सिक्की कला की कलाकार सुधीरा देवी ने सैंपल के तौर पर कुछ जोड़ी जूते-चप्पल का निर्माण किया था। इसे वाट्सएप के माध्यम से सिक्की के उत्पाद खरीदने वालों के पास भेजा। पसंद आने पर कुछ दिन पहले अटल भारत फाउंडेशन, हाथ वाला एनजीओ दिल्ली, अनुजा संस्था लखनऊ और सत्या फाउंडेशन पटना से 100-100 जोड़ी जूते-चप्पल के आर्डर मिले हैं। कारीगर ऑफ इंडिया दिल्ली व शिल्पग्राम दरभंगा से 50-50 जोड़ी और अन्य जगहों से 100 जोड़ी जूते-चप्पल के आर्डर मिले हैं। इसे पूरा करने में एक दर्जन कलाकार जुटी हैं।


15 लाख तक के सालाना कारोबार की उम्मीद : सिक्की घास जुलाई से सितंबर के बीच तालाब या सड़क किनारे स्वत: निकल आती है। यह बाजार में भी 250 से 350 प्रतिकिलो की दर से मिलती है। इसे विभिन्न रंगों में रंगकर चाकू और टकुआ (लोहे का नुकीला औजार) की मदद से जूते या चप्पल बनाया जाता है। तीन सौ से एक हजार कीमत वाले जूते या चप्पल तैयार करने में एक कलाकार दो दिन का समय लग जाता है। इसमें लागत बिक्री मूल्य का 25 फीसद तक आती है। बड़े पैमाने पर ऑर्डर मिलने पर एक कलाकार को साल में एक लाख तक की आमदनी की उम्मीद है। कलाकार राधा कुमारी, अर्चना कुमारी और विभा कुमारी का कहना है कि घर बैठे बेहतर कमाई हो रही है। सुधीरा सालाना 15 लाख तक का कारोबार होने के प्रति आशान्वित हैं।

इंडिया टाय फेयर से मिली पहचान : दिल्ली में इस साल फरवरी-मार्च में आयोजित इंडिया टाय फेयर में सुधीरा देवी शामिल हुई थीं। उनके बनाए सिक्की के खिलौने लोगों ने काफी पसंद किए थे। इससे मधुबनी की इस कला को देश-दुनिया में पहचान मिली। अटल भारत फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रदीप झा ने बताया कि वे इको फ्रेंडली सिक्की के जूते-चप्पल फाउंडेशन के पदाधिकारियों को उपहार स्वरूप भेंट करेंगे। सिविल सर्जन डॉ. सुनील कुमार झा का कहना है कि चमड़ा, प्लास्टिक, फोम, रबर की जगह सिक्की के जूते-चप्पल का कोई साइड इफेक्ट नहीं होगा। यह ब्लड प्रेशर के रोगियों के लिए लाभकारी है। वस्त्र मंत्रालय (हस्तशिल्प) के सहायक निदेशक मुकेश कुमार का कहना है कि टाय फेयर के बाद सिक्की कला को बड़ा बाजार मिलने लगा है। इसके विकास के लिए बाजार उपलब्ध कराने के साथ प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।





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