बात जब भी 1857 के विद्रोह की होती है तो बिहार से नाम आता है बाबू वीर कुंवर सिंह का। इनकी कहानियां आप सब ने बचपन में ही पढ़ी होंगी कि कैसे कुंवर सिंह ने अंग्रेजों से लोहा लिया और जब अंग्रेज अफसर ने उनकी बाह में गोली मार दी तो उन्होंने अपना हाथ खुद से काट कर गंगा मैया को चढ़ा दिया था। उस बाबू कुंवर सिंह की धरती है भोजपुर। यहां महाराजा कॉलेज आप पहुंचेगे तो इसके कैंपस में वीर कुंवर सिंह संग्रहालय की इमारत दिखती है। इस कैंपस में बाबू कुंवर सिंह की मूर्ति भी है। लेकिन संग्रहालय में उनसे जुड़ी एक भी चीज नहीं है। पूरे संग्रहालय परिसर का बुरा हाल है। न कोई साफ-सफाई न और कुछ। जिस पर वीर कुंवर सिंह संग्रहालय लिखा है उस पर भी पेड़ उग आए हैं। अंदर जाने पर एक सुरंग है।
बेहतर इस्तेमाल हो सकता है पर किसी को परवाह नहीं
जानकारी है कि यह गोपनीय सुरंग बाबू कुंवर सिंह ने अंग्रेजों से बचकर सीधे जगदीशपुर पहुंचने के लिए बनवाई थी। लोग यह भी बताते हैं कि यह सुरंग कलेक्टर के ऑफिस में भी निकलती है। लोग बताते हैं कि किसी जमाने में कुंवर सिंह से जीवन से जुड़ी सामग्री यहां रखी हुई थी। इस संग्रहालय में कुंवर सिंह से जुड़ी कोई सामाग्री ही नहीं है तो इसका इस्तेमाल बेहतर पुस्तकालय के रुप में भी किया जा सकता है, जहां आजादी से जुड़ी किताबें आदि हों। लेकिन इस भवन का कोई इस्तेमाल नहीं हो रहा।
कभी यहां कुंवर सिंह से जुड़ी सामाग्री हुआ करती थी
भास्कर ने जाने माने लेखक और महाराजा कॉलेज के पूर्व प्राचार्य गांधी जी राय से बात की। उन्होंने दुख प्रकट करते हुआ बताया कि यह भवन कुंवर सिंह का आरा हाउस हुआ करता था। इसी के ऊपर बाबू कुंवर सिंह संग्रहालय था। यहां की काफी सामाग्री जगदीशपुर ले जायी गई। राज्य सरकार की ओर से यहां एक केयर टेकर हुआ करता था। यहां कुंवर सिंह से जुड़ी कई सामाग्री थी। बहुत सारी सामाग्री जगदीशपुर ले जायी गई और यह भवन वीरान होता गया। वे बताते हैं कि महाराजा कॉलेज के प्रिंसिपल चैबर के नीचे पोर्टिको के नीचे एक किला भी है और भीतर ही भीतर यहां से जाने का रास्ता आरा हाउस तक है। 13 साल हो गए कॉलेज से मुझे रिटायर हुए। जब मैं यहां था उस समय किला के रास्ते में लाइट आदि भी लगवाया था। इसकी जर्जर स्थिति पर वे भी अफसोस जताते हैं।







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