नीतीश कुमार (Bihar CM Nitish Kumar) के नाम एक और इतिहास बन गया है कि 15 वीं बार वह मुख्यमंत्री के रूप में ध्वजारोहण किया। उनसे संस्मरणों को दैनिक जागरण से साझा किया सूचना एवं जनसंपर्क तथा जल संसाधन मंत्री संजय झा ने। वह कहते हैं कि भारत आज 75वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। यह सही अवसर है, जब देश के उस भूभाग में आए उतार-चढ़ावों पर एक नजर डाली जाए, जो लोकतंत्र की जननी है और जिसका इतिहास गौरवशाली है। जिन लोगों ने बिहार के इतिहास को पढ़ा-समझा और हाल के दशकों में सफर को देखा-जाना है, उनके मन में खट्टी-मीठी यादों का पुलिंदा है। लेकिन, साथ में मुख्यमंत्री के रूप में सबसे लंबा कार्यकाल पूरा करने वाले नीतीश कुमार के रूप में उम्मीद जगाता एक लोकप्रिय चेहरा भी है, जिनका व्यक्तित्व, कृतित्व और कुशल नेतृत्व क्षमता उन्हें विशिष्ट बनाता है। वे आज सुशासन के 5474 दिन पूरे कर रहे हैं और स्वतंत्रता दिवस पर 15वीं बार (सर्वाधिक) तिरंगा फहरा चुके हैं।

बिहारियों को गर्व है कि भगवान गौतम बुद्ध, गुरु गोविंद सिंह और माता सीता की जन्मभूमि बिहार संत-महात्माओं और ऋषि-मुनियों की धरती रही है। नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय दुनियाभर के अध्येताओं के लिए ज्ञान के प्रमुख केंद्र थे। आचार्य चाणक्य, आर्यभट्ट, मंडन मिश्र, विद्यापति जैसे मनीषियों ने इस पवित्र भूमि के ज्ञान गौरव को आगे बढ़ाया। लेकिन, स्वतंत्रता के बाद कुछ काल खंड ऐसे भी आए, जब बिहार के गौरवशाली अतीत की चमक फीकी पड़ गई। इसे बीमारू राज्य और देश पर बोझ कहा जाने लगा।

गड्ढों में तब्दील सड़कें, अंधेरे में डूबे गांव-शहर, जातीय-धार्मिक और नक्सली हिंसा का तांडव, बाहुबलियों का आतंक, वोटों की लूट, अपहरण के डर से कारोबारियों के साथ-साथ पूंजी, प्रतिभा एवं श्रम का पलायन और सत्ता के शीर्ष से भ्रष्टाचार को संरक्षण-आजादी के पांच-छह दशक बाद देश-विदेश में बिहार की चर्चा इन्हीं बातों के लिए हो रही थी। बिहार और बिहारी शब्द अराजकता और पिछड़ेपन के पर्याय बन गए थे। आलू और बालू वाले प्रदेश के नवनिर्माण के संकल्प के साथ 2005 में सत्ता में आए इंजीनियर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दृढ़ इच्छाशक्ति और दूरदर्शितापूर्ण फैसलों के जरिए बिहारियों को शर्मिंदगी तथा पहचान छिपाने से आजादी दिलाई।
(इस लेख में दिए गए विचार बिहार सरकार के मंत्री संजय झा के हैं।)


Input : Dainik Jagran



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