कोरोना की तीसरी लहर की तैयारी में अब बच्चों के पोषण और सामान्य वैक्सीनेशन पर काम किया जा रहा है। इसके लिए स्वास्थ्य विभाग ने आशा को विशेष मिशन पर लगाया है। बिहार में शिशु मृ’त्यु दर की रफ्तार को कम करने के साथ कोरोना के खतरे से बचाव को लेकर कई बड़ी तैयारी चल रही है। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि 3 से लेकर 15 माह तक के बच्चों को लेकर बिहार में नई पहल की जा रही है।
कुपोषण पर वार कर कोरोना से लड़ाई
बिहार में कुपोषण पर वार कर कोरोना से लड़ाई की तैयारी की जा रही है। देखभाल और पोषण से नवजात शिशुओं एवं छोटे बच्चों को स्वस्थ रखने की कवायद चल रही है। इसी कड़ी में 3 माह से 15 माह तक के बच्चों के लिए भी राज्य में एक नई पहल कर रहा है। अब 3 माह से 15 माह तक के बच्चें को आशा कार्यकर्ता घर-घर जाकर देखभाल करेंगी। इसमें शिशु के स्वास्थ्य एवं पोषण का पूरा ख्याल रखा जाएगा।
आशा घर घर जाकर छोटे बच्चों में स्तनपान, टीकाकरण, स्वच्छता, पूरक आहार, एनीमिया एवं आहार विविधिता का ख्याल रखेंगी। इसके साथ ही छोटे बच्चों में होने वाली संभावित स्वास्थ्य समस्या की पहचान कर उसके सही प्रबंधन के लिए माता-पिता को उचित सलाह देंगी।
13 जिलों में चल रही तैयारी
स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय का कहना है कि घर पर जाकर देखभाल कार्यक्रम (एचबीवाईसी) की राज्य के 13 जिलों में शुरुआत की गई है। इसमें कटिहार, नवादा, शेखपुरा, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, बेगूसराय, जमुई, औरंगाबाद, गया, सीतामढ़ी, बांका, खगड़िया एवं अररिया जिले शामिल हैं। इन जिलों में कार्यक्रम की शुरुआत करने के बाद इसे पूरे बिहार के सभी जिलों में लागू किया जाएगा।
बच्चों के घर 5 बार होगा दौरा
मिशन के तहत आशा कार्यकर्ता 3 माह से 15 माह तक के बच्चों के घर का दौरा कुल 5 बार करेंगी, जिसमें 3 माह, 6 माह, 9 माह, 12 माह एवं 15 वें माह का दौरा शामिल होगा। इसको लेकर चिह्नित जिलों में आशा एवं एएनएम को प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। अभी तक राज्य में सिर्फ गृह आधारित नवजात शिशु देखभाल कार्यक्रम के तहत आशा 42 दिनों तक नवजात शिशु के घर का दौरा करती हैं।
संस्थागत प्रसव की स्थिति में 6 बार एवं गृह प्रसव की स्थिति में 42 दिन तक सात बार गृह भ्रमण करती हैं, लेकिन छोटे बच्चों के लिए गृह आधारित देखभाल कार्यक्रम के शुरू होने से नवजात बच्चों के साथ अब 15 माह तक के बच्चों के स्वास्थ्य की मॉनिटरिंग संभव हो सकेगी।
बच्चों की मृत्यु दर को कम करने में काम
स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय का कहना है कि इस विशेष कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य बच्चों की मृत्यु दर में कमी लाना है। पिछले वर्ष के सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे में बिहार की शिशु मृत्यु दर 3 अंक घटकर राष्ट्रीय औसत के बराबर हो गई है। वर्ष 2017 में बिहार की शिशु मृत्यु दर 35 थी, जो वर्ष 2018 में घटकर 32 हो गई। नवजात मृत्यु दर में भी 3 अंकों की कमी आई है।
बिहार की नवजात मृत्यु दर जो वर्ष 2017 में 28 थी जो वर्ष 2018 में घटकर 25 हो गई। 3 माह से लेकर 15 माह तक के बच्चों के लिए शुरू की गई गृह आधारित देखभाल कार्यक्रम से 5 साल के अंदर वाले बच्चों की मृत्यु दर में कमी संभव हो सकेगी। बच्चों का बेहतर स्वास्थ्य समाज, राज्य एवं देशहित के लिए काफी जरूरी भी है।




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