हनुमानगढ़ी के महन्त प्रेम दास के इस बयान पर कि पटना महावीर मंदिर अयोध्या के हनुमानगढ़ी से संचालित होता था, इस पर महावीर मन्दिर की तरफ से कड़ी प्रतिक्रिया दी गई है। हनुमान मंदिर की तरफ से कहा गया कि हनुमानगढ़ी के गद्दीनशीन महन्त प्रेम दास का बयान झूठा है। महावीर मन्दिर की व्यवस्था कभी हनुमानगढ़ी से नहीं होती थी। अतीत में गोसाईं गृहस्थों के अधीन यह मन्दिर करीब 50 वर्षों तक था। 1948 ई. के फैसले में पटना हाईकोर्ट ने इसे सार्वजनिक मन्दिर घोषित किया और यहां पुजारी एवं प्रबन्ध-समिति की व्यवस्था की। 1987 ई. में इसके लिए एक न्यास समिति का गठन बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड द्वारा किया गया। उस आदेश के खिलाफ गोपाल दास हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक गए, जहां उनकी हार हुई और वर्तमान न्यास-समिति की वैधता बरकरार रही। प्रेम दास के बयान का महत्त्व सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के ऊपर नहीं हो सकता।
झूठ से बाज नहीं आ रहे
पटना महावीर मंदिर की तरफ से कहा गया है कि प्रेमदास का दूसरा बयान है कि किशोर कुणाल जब पटना के SSP थे, तब उन्होंने गोपाल दास को झूठे मुकदमे में फंसाकर जेल भिजवा दिया। यह सरासर गलत है। कुणाल पटना के SSP 15/04/1983 से 12/07/1984 तक थे। उसके बाद वे बिहार कैडर से बाहर चले गए, क्योंकि उनका कैडर गुजरात था। गोपाल दास अक्टूबर, 1987 में वैशाली जिले में एक विधवा और उसके नाबालिग बेटे की हत्या के काण्ड में जेल गए थे। कुणाल के बिहार कैडर से हटने के सवा तीन साल बाद। यह बात गद्दीनशीन जी को बताई गई थी, फिर भी वे झूठ से बाज नहीं आ रहे हैं। यहां विडम्बना यह है कि गोपाल दास के जिस शिष्य महेन्द्र दास को इन्होंने अनधिकृत रूप से महावीर मन्दिर का महन्त बनाया है, उन्हीं ने वैशाली जिले के एक केस में अपने गुरु के बारे में अदालत में शपथ पत्र पर कहा है कि गोपाल दास एक अपराधी थे और उन्होंने इस्माईलपुर में एक विधवा एवं उसके नाबालिग बेटे का मर्डर करवाया था।
तीसरा बयान भी भ्रामक
महंत प्रेम दास का तीसरा बयान भी भ्रामक है। सूर्यवंशी दास को किशोर कुणाल गुरु रविदास मन्दिर, अयोध्या से पटना ले गए थे। उस आयोजन में हनुमानगढ़ी के साधुओं ने दलित पुजारी की नियुक्ति का बहिष्कार किया था। आमन्त्रण मिलने पर भी हनुमानगढ़ी से कोई नहीं आया था, बल्कि वे लोग कुणाल से इसके लिए बरसों तक नाराज थे। कुणाल के निमन्त्रण पर राम जन्मभूमि न्यास के तत्कालीन अध्यक्ष महन्त रामचन्द्र परमहंस महाराज, गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज तथा पंचगंगा घाट से महन्त अवध बिहारी दास आए थे। सूर्यवंशी दास को यहां पूरे सम्मान के साथ 28 वर्षों तक रखा गया था। उन्हें महामण्डलेश्वर तथा राम जन्मभूमि में भी ट्रस्टी बनवाने का प्रयास कुणाल द्वारा किया गया था। इसे प्रेम दास अच्छा बर्ताव नहीं कहते। सूर्यवंशी दास को उनके मूल स्थान गुरु रविदास मन्दिर के महन्त बनवारी पति उर्फ ब्रह्मचारी ने दि- 07/07/2021 को हटाया है और उनके स्थान पर आचार्य अवधेश दास जी को नियुक्त किया है। वे महावीर मन्दिर में कार्य कर भी रहे हैं। प्रेम दास को विवाहित एवं एक बच्चे के पिता सूर्यवंशी दास से इतनी सहानुभूति है, तो हनुमानगढ़ी मन्दिर में पुजारी रख लें। हम उनकी जय-जयकार करेंगे, लेकिन उनसे आग्रह है कि दोहरा मानदण्ड न अपनाएं।
बेबुनियाद आरोप
महंत प्रेमदास का चौथा आरोप है कि कुणाल अपने बेटे को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते हैं, यह भी बिल्कुल बेबुनियाद है। उन्हें महावीर मन्दिर की परम्परा और कानूनी स्थिति का ज्ञान नहीं है। 1948 ई. में हाईकोर्ट के फैसले के बाद महावीर मन्दिर में महन्ती प्रथा समाप्त हो गई। यहां मन्दिर की व्यवस्था न्यास-समिति के द्वारा चलती है। न्यास समिति का गठन बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड द्वारा होता है। कुणाल करीब 10 साल बोर्ड के अध्यक्ष थे, लेकिन 10 मार्च, 2016 को स्वयं इस्तीफा देकर पटना एवं अयोध्या में जनहित कार्य में लग गए। इसलिए महावीर मन्दिर में कुणाल न तो महन्त हैं और न ही उनके पास अपना उत्तराधिकारी बनाने का अधिकार है। प्रेमदास से एक अनुरोध है कि वे हनुमानगढ़ी में अपने दाहिने-बाएं उन महन्तों को देखें, जो साधु, वीतराग और गृहत्यागी हैं। उनमें से किन-किन ने अपने भतीजों एवं रिश्तेदारों को अपना उत्तराधिकारी बनाया है, यदि उनको रोक सकें, तो वह उनकी बड़ी उपलब्धि होगी।
सबको अधिकार है
प्रेम दास ने कहा है कि उन्होंने धार्मिक न्यास बोर्ड में हनुमानगढ़ी के अधिकार के लिए आवेदन दे रखा है, इसका स्वागत है। लोकतन्त्र में हर नागरिक को कुछ भी प्राप्त करने के लिए न्यायालय की शरण में जाने का अधिकार है। कल कोई ताजमहल पर स्वामित्व का दावा ठोकता है, तो कोई रोक नहीं सकता। भले ही वह खारिज हो जाए। महावीर मन्दिर की वर्तमान न्यास समिति के विरुद्ध मुकदमा सुप्रीम कोर्ट से दो बार खारिज हो चुका है। एक बार अपील में और दूसरी बार समीक्षा में। प्रेम दास से एक अनुरोध है कि आप जिस गद्दी पर बैठे हैं, उसकी गरिमा का पालन करें। हनुमानगढ़ी देश के करोड़ों भक्तों की अगाध श्रद्धा का केन्द्र है। हनुमानगढ़ी को वैटिकन सिटी जैसा सर्व-अधिकार-सम्पन्न बना दें, तो सबको अपार हर्ष होगा। किन्तु आप चरित्र-हनन और झूठ का सहारा न लें। यह गद्दीनशीन की गरिमा के अनुकूल नहीं है।




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