झारखंड विधानसभा की 81 सीटों पर वोटों की गिनती जारी है। रुझानों में ये साफ हो गया है बीजेपी इस बार 2014 विधानसभा चुनाव जैसा प्रदर्शन नहीं कर पाएगी। सत्तारूढ़ दल बीजेपी को पहले जितनी सीटें नहीं मिल पाएगी। पिछली बार उसका आजसू से चुनाव पूर्व गठबंधन था लेकिन इस बार वह अकेले चुनावी अ’खाड़े में उतरी। झारखंड राज्य के 19 साल के राजनीतिक इतिहास में आज तक ऐसा कोई सीएम नहीं रहा, जो चुनाव जीतकर फिर सत्ता पर काबिज हो गया हो। चुनावों में सत्तारूढ़ पार्टी कभी अपनी सरकार नहीं बचा पाई। झारखंड विधानसभा में बीजेपी के पिछड़ने और पहले से ख’राब प्रद’र्शन के पीछे कई वजह बताई जा रही है जैसे चुनाव प्रचार के दौरान स्थानीय मुद्दों की बजाय राष्ट्रीय मुद्दों को उछालना, गैर आदिवासी सीएम चेहरा, आदिवासियों को नाराज करना, सरयू राय जैसे कद्दावर नेताओं की बगावत वगैरह वगैरह। यहां जानें बीजेपी के खराब प्रदर्शन की 10 बड़ी वजह-

1. महागठबंधन एकजुट, बीजेपी अकेली
2014 के विधानसभा चुनाव विपक्ष एकजुट नहीं था लेकिन इस बार एकुजट था। चुनाव से काफी पहले झामुमो, कांग्रेस और आरजेडी ने महागठबंधन बना लिया था। बेहतर तालमेल से महागठबंधन मतदान से काफी पहले सीटों का बेहतर ढंग से बंटवारा कर पाया। सही दिशा, सटीक रणनीति के साथ चुनाव प्रचार कर पाया। उन्हें चुनाव प्रचार का अच्छा समय मिला। वहीं दूसरी ओर बीजेपी अंतिम समय तक आजसू से गठबंधन को लेकर कंफ्यूज रही। आजसू से गठबंधन को लेकर वह अंतिम समय तक फैसला नहीं कर पाई। फिर आखिर में तय हुआ कि आजसू से गठबंधन नहीं होगा। सीट बंटवारे और चुनाव प्रचार में देरी ने बीजेपी की प्रदर्शन पर असर डाला। कई सीटों पर आजसू ने बीजेपी को नु’कसान पहुंचाया।
2- स्थानीय मुद्दों की अनदेखी
भाजपा के बड़े नेताओं ने पूरे झारखंड के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दों पर ही बात की। परिणाम बताते हैं कि यह मतदाताओं को पसंद नहीं आया। इस बार चुनाव पिछले बार से 1.3 प्रतिशत कम मतदान दर्ज किया गया था। तीसरे चरण के बाद हुए चुनावी प्रचार में एनआरसी जैसे मुद्दे भी छाए रहे। राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी होने की भी बातें अधिकांश रैली में हुई। वहीं दूसरी तरफ एकजुट महागठबंधन चुनाव प्रचार के दौरान लगातार स्थानीय मुद्दों और आदिवासी हितों को उछालता रहा।

3- गैर-आदिवासी सीएम चेहरे के साथ उतरना पड़ा भारी :
81 सीटों वाली झारखंड विधानसभा में 28 सीटें आदिवासियों के लिए रिजर्व हैं। महागठबंधन (झामुमो, कांग्रेस, आरजेडी) ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार (हेमंत सोरेन) आदिवासी को ही बनाया। दूसरी तरफ बीजेपी के रघुवर दास गैर-आदिवासी हैं। ऐसे में आदिवासी वोट बीजेपी के खिलाफ गोलबंद हुआ। 2014 में बीजेपी ने AJSU के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन में 30 फीसदी आदिवासी वोट (एसटी) और 13 एसटी आरक्षित सीटें हासिल की थी। 2014 में जब बीजेपी चुनाव में उतरी थी तब रघुवर दास चुनाव में सीएम पद के लिए बीजेपी का चेहरा नहीं थे।
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