सरपट रास्तों पर ठहरी जिंदगी…। पीछे पानी अथाह, सामने रफ्तार। जिले की करीब 10 हजार बाढ़ पीडि़त आबादी इन्हीं मुसीबतों के बीच एक-एक दिन काट रही है। यह स्थिति पिछले एक महीने से है। लोग नेशनल और स्टेट हाईवे के किनारे पॉलीथिन टांगकर जीवन जी रहे हैं। मुजफ्फरपुर में बूढ़ी गंडक, गंडक, बागमती, मनुषमारा और लखनदेई नदियों से तबाही मची है। कटरा, औराई, गायघाट, मीनापुर व कांटी प्रखंड के करीब पौने तीन लाख लोग प्रभावित हैं। इनमें से अधिकतर विस्थापित जीवन जी रहे हैं

गांवों में कमर भर पानी
मुजफ्फरपुर-दरभंगा (एनएच-57), मुजफ्फरपुर-सीतामढ़ी (एनएच-77 और 527-सी) के एक लेन पर बाढ़ पीडि़तों और इनके पशुओं का कब्जा है। औराई के खुर्द निवासी किशोर मांझी कहते हैं, देख लू बाबू…बाढ़ हम्मन के सड़क पर ला देलक। उनकी बात भी सही है…गांव में कमर भर पानी है।
10 किमी सड़क पर तने पॉलीथिन के तंबू : जिले में करीब 10 किमी में अलग-अलग सड़कों के किनारे पॉलीथिन के तंबू तने हैं। औराई में एक दर्जन गांव के एक हजार लोग एक किमी में शरण लिए हैं। मीनापुर में करीब आठ हजार लोग चार किमी में सड़क किनारे रह रहे हैं। एनएच-77 पर मकसूदपुर, मकसूदपुर बलान आदि गांवों के करीब एक हजार परिवार डेरा डाले हैं। वासदेव छपरा, मीनापुर व पुरेनिया महद्रिया के भी सैकड़ों परिवार मुजफ्फरपुर-शिवहर मुख्य मार्ग पर आ गए हैं। एनएच-57 के किनारे एक किमी में करीब दो सौ परिवार शरण लिए हैं।

रफ्तार से लगता है डर
औराई के रामदेव पासवान की पीड़ा सुनिए… घर में दू फीट पानी घुस गेल, तब बाल-बच्चा अउर मवेशी लेके रोड पर चल अइली। लेकिन, इहां भी परेशानी लागले रह गेल। बाल-बच्चा के सांप-बिच्छू अ घोड़ा-गाड़ी से पिचायके खतरा बनल रहई छई।

सामुदायिक रसोई व टेंट का सहारा
मीनापुर में बाढ़ पीडि़तों के लिए प्रशासन की ओर से करीब तीन हजार मीटर पॉलीथिन दी गई है। चार सामुदायिक रसोई केंद्रों में करीब छह हजार से अधिक लोगों के लिए सुबह-शाम का खाना बन रहा है। 15 चलंत शौचालयों की व्यवस्था है। स्कूलों में पानी लगा है, इसलिए उन्हें आश्रय स्थल नहीं बनाया गया। कटरा में चार-पांच आश्रय केंद्र हैं, लेकिन लोगों की संख्या ज्यादा होने से कुछ लोग सड़क किनारे शरण लिए हैं। कांटी में प्रशासन की ओर से टेंट, मेडिकल कैंप की व्यवस्था है। तीन सामुदायिक रसोई में करीब दो सौ परिवार का खाना बन रहा है।



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