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LJP में वर्चस्व की लड़ाई का क्या होगा अंजाम, क्या चिराग पासवान को मिलेगी विरासत?

पटना. बिहार में पासवान वोटबैंक पर दावे को लेकर अब एलजेपी (LJP) में ही लड़ाई शुरू हो गई है. पिछले चार दशकों से तकरीबन इस वोटबैंक पर दिवंगत रामविलास पासवान (Ram Vilas Paswan) का एकाधिकार रहा है. अब उनके लख्ते जिगर चिराग पासवान (Chirag Paswan) को इसी वोटबैंक को साधने में जोर-आजमाइश करनी पड़ रही है. चिराग पासवान को अपने ही सगे चाचा पशुपति कुमार पारस (Pashupati Kumar Paras) और चचेरे भाई प्रिंस राज (Prince Raj) से लोहा लेना पड़ रहा है. पार्टी में वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई है. चिराग पासवान जहां अब अपने पिता की छवि को ही आधार मान कर पासवान वोटबैंक को साधने में जुट गए हैं. वहीं, पशुपति पारस अपने भाई के प्यार और पार्टी में इतने सालों की मेहनत का हवाला दे कर पासवान वोटबैंक पर हक जता रहे हैं. राजनीतिक जानकारों की मानें तो पार्टी में वर्चस्व की इस लड़ाई का असर केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार पर भी पड़ा है. केंद्रीय कैबिनेट का विस्तार टलने में कहीं न कहीं यह भी एक कारण हो सकता है.

एलजेपी में वर्चस्व की लड़ाई का क्या होगा अंजाम
बता दें कि बिहार में पासवान जाति के 4 से 5 फीसदी वोट हैं. इसे एलजेपी का आधार वोट बैंक माना जाता है. एलजेपी के संस्थापक रामविलास पासवान अपने इसी वोट बैंक के जरिए बिहार से लेकर केंद्र की राजनीति में प्रभावी रहे. अब जब पार्टी में टूट हो गई है तो सवाल ये खड़ा हो रहा है कि पासवान वोटर्स किसके साथ हैं? राजनीतिक जानकारों की मानें तो बीजेपी चिराग पासवान की आशीर्वाद यात्रा पर नजर टिकाए हुए है. इस यात्रा की सफलता पर ही निर्भर होगा कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में पशुपति कुमार पारस आएंगे या फिर चिराग पासवान की ताजपोशी होगी.

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बिहार में पासवान जाति के 4 से 5 फीसदी वोट हैं. (फाइल फोटो)

क्या कहते हैं जानकार
बिहार को करीब से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर कहते हैं, ‘रामविलास पासवान की जो छवि थी वह न तो चिराग पासवान में है और न ही पारस में है, लेकिन देश में पिछले कुछ सालों से देखा जा रहा है कि जाति और पंथ के नाम पर वोट पड़ रहे हैं. पार्टी का सुप्रीमो जिस पर हाथ रख देता है वही पंथ और जाति का नेता बन जाता है. फिर भी पासावन वोटर किसको पसंद करते हैं या किसको चाहते हैं यह कहना अभी जल्दबाजी होगी. दोनों लोग जब जनता के पास जाएंगे तो फिर पता चलेगा कि लोग किसको पसंद करते हैं. पशुपति पारस भी रामविलास पासवान के ही भाई हैं और बिहार में लंबे समय तक वह अकेले ही पार्टी को चलाते आ रहे हैं. चिराग की आशीर्वाद यात्रा के बाद स्थिति स्पष्ट हो जाएगी कि पासवान वोटर्स किसके साथ जाएंगे.’

रामविलास की विरासत को संभाल पाएंगे चिराग
बता दें कि बिहार की राजनीति में रामविलास पासवान का लंबे समय तक सिक्का चला है. बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले रामविलास पासवान की मौत हो गई और चिराग पासवान ने अकेले ही चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया. बीते विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान पार्टी के एकमात्र स्टार प्रचारक थे. इस चुनाव में पार्टी मात्र एक सीट जीतने में कामयाब हुई, लेकिन पार्टी ने जेडीयू के तकरीबन दो दर्जन उम्मीदवारों को हराने का काम किया. हालांकि, पार्टी को 6 फीसदी तक वोट जरूर मिले.

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एलजेपी के 5 सांसदों ने चिराग पासवान को पार्टी के अध्यक्ष पद से हटा दिया.

चाचा-भतीजे की लड़ाई में जीत किसकी होगी
विधानसभा चुनाव के तकरीबन 7-8 महीने बाद पशुपति पारस सहित एलजेपी के 5 सांसदों ने चिराग पासवान को पार्टी के अध्यक्ष पद से हटा दिया. पशुपति पारस को लोकसभा में संसदीय दल के नेता के तौर पर भी मान्यता मिल गई है. इससे पहले चिराग पासवान लोकसभा में एलजेपी के संसदीय दल के नेता थे. इस पूरे घटनाक्रम के बाद पारस गुट और चिराग गुट दोनों ने चुनाव आयोग में जा कर असली एलजेपी होने का दावा किया है. हालांकि, पार्टी के संविधान के हिसाब से चुनाव आयोग में चिराग पासवान का दावा मजबूत नजर आ रहा है.

कुल मिलाकर बिहार में अगले कुछ दिनों तक एलजेपी के अंदर घमासान रहेगा. अगर बिहार में पासवान वोटर्स की बात करें तो वह तकरीबन 4 से 5 फीसदी हैं. बीते कई सालों से एलजेपी खासकर रामविलास पासवान के ये कोर वोटर रहे हैं. रामविलास पासवान अपने इसी वोट बैंक के जरिए सियासत करते रहे हैं. अब जब पार्टी में टूट हो गई है तो चिराग के पास रामविलास पासवान की वसीयत और विरासत दोनों बचाने की जिम्मेवारी है.

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