
इसके प्र’भाव के कारण भी कुछ मा’मलों में ऐसी घ’टनाएं घटित होती हैं। कई मा’मलों में दु’ष्कर्म की घट’नाओं का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया यथा – व्हाट्सएप, फेसबुक आदि पर प्रसा’रित कर दिए जा रहे हैं। विशेष रूप से बच्चों एवं कम उम्र के कुछ युवाओं के मस्तिष्क को इस तरह की सामग्री गं’भीर रूप से प्र’भावित करती है।मुख्यमंत्री ने लिखा है कि कई मा’मलों में इस तरह की सामग्री का उपयोग ऐसे अप’राधों के का’रक के रूप में सामने आये हैं। इसके अतिरिक्त ऐसी सामग्री के दी’र्घकालीन उपयोग से कुछ लोगों की मानसिकता न’कारात्मक रूप से प्रभावित हो रही है। इससे अनेक सामाजिक स’मस्याएं उत्पन्न हो रही हैं तथा महिलाओं के प्रति अप’राधों में वृद्घि हो रही है। उन्होंने यह भी लिखा है कि यद्यपि इस संबंध में इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2000 (यथा संशोधित 2008) में प्रावधान किए गए हैं, परन्तु वे प्रभावी नहीं हो पा रहे हैं।

उच्चतम न्यायालय द्वारा भी इस संबंध में सरकार को कई दिशा-निर्देश दिए गए हैं। मेरे विचार से अभिव्यक्ति एवं विचारों की स्वतंत्रता के नाम पर इस तरह की अनुचित सामग्री की असीमित उपलब्धता उचित नहीं है। महिलाओं एवं बच्चों के वि’रुद्ध हो रहे ऐसे अ’पराधों के निवारण के लिए ‘प्रभा’वी का”र्रवाई किया जाना नि’तांत आवश्यक है। इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स) को भी कड़े निर्देश देने की आवश्यकता है। साथ ही विभिन्न हितधा’रकों यथा- अभिभावकों, शैक्षिक संस्थानों एवं गैर-सरकारी संगठनों के सहयोग से व्यापक जागरूकता अभियान चलाना भी आवश्यक है। अत: मेरा अ”नुरोध होगा कि इस गं’भीर विषय पर तत्काल विचार करते हुए इंटरनेट पर उपलब्ध ऐसी पो’र्न साइट्स तथा अनुचित सामग्री पर प्रति’बंध लगाने के लिए शीघ्र का’र्रवाई करने की कृपा करें।




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