पटना. बिहार की नीतीश सरकार (Nitish Government) सबसे भ्रष्ट है. शराबबंदी बिहार का सबसे बड़ा घोटाला है. सत्ता में आने पर मैं नीतीश कुमार को जेल भेजूंगा…ये उन बातों के चंद उदाहरण हैं जो 2020 के विधानसभा चुनाव के दौरान चिराग पासवान (Chirag Paswan) ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए कही थीं. एनडीए से अलग होकर लोजपा का अकेले चुनाव लड़ने का फैसला और जेडीयू उम्मीदवारों के खिलाफ अपने प्रत्याशी उतारने जैसे कुछ ऐसे फैसले भी रहे जो सीएम नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) के लिए सीधी चुनौती रहे. लोजपा के इस एक्शन की वजह से ही बिहार एनडीए (Bihar NDA) में सीएम नीतीश की पार्टी जनता दल यूनाइटेड बड़े भाई की भूमिका खोकर राज्य में तीसरे नंबर की पार्टी बन गई. अब करीब 7 महीने बाद जब लोक जनशक्ति पार्टी में बड़ी फूट हो गई और चिराग पासवान अकेले पड़ गए तो माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चिराग पासवान से पिछले विधानसभा चुनाव में अपने उस अपमान का बदला लिया है.
राजनीतिक जानकारों की मानें तो सीएम नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के चाणक्य माने जाते हैं. उन्होंने अपने राजनीतिक पांडित्य का कौशल कई बार दिखाया है. राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी पार्टी भाजपा को बिहार में छोटी भूमिका में रखना हो या फिर लालू प्रसाद यादव के स्थापित सत्ता-समीकरण को ध्वस्त कर पिछले 16 वर्षों से बिहार में सत्ता की कमान खुद के हाथों में रखना हो, सियासत के इस मास्टर ने कदम दर कदम साबित किया है कि बिहार की राजनीति में उनसे माहिर खिलाड़ी फिलहाल तो कोई नहीं है.खामोश नीतीश का मतलब सियासी तूफान!
वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि नीतीश कुमार अपने सभी ऑपरेशन को खामोशी से ही अंजाम देते रहे हैं. इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया. भले ही बीते विधानसभा चुनाव में पहले चरण में पिछड़ने के बाद लोगों को लगा कि नीतीश ही सही विकल्प हैं तो बिहार के मतदाताओं ने उन्हें फिर से सत्ता में वापस आने का मौका मामूली बहुमत से दे ही दिया. हालांकि, इस दौरान नीतीश कुमार की पार्टी 43 सीटों के साथ राजद और भाजपा के बाद तीसरे नंबर की पार्टी बन गई. नीतीश कुमार ऐसे नेता हैं जो वक्त का इंतजार करते हैं और अपना मास्टरस्ट्रोक मार देते हैं.
विधानसभा चुनाव में ही पड़ गई थी फूट की नींव
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार कहते हैं कि नीतीश कुमार ने चिराग की रोशनी बुझाने की नीति तब ही बना ली थी जब उन्हें लगा कि लोजपा के अधिकतर नेताओं की राय एनडीए के साथ विधानसभा चुनाव लड़ने की थी, लेकिन चिराग ने किसी की नहीं मानी. इसके बाद एक और प्रकरण हुआ जब विधानसभा चुनाव के दौरान चिराग ने जदयू के खिलाफ उम्मीदवार उतारने का फैसला किया तो उनके सांसद चाचा पशुपति पारस ने इसका विरोध किया.
चिराग पासवान की अनुभवहीनता LJP पर पड़ी भारी
इसी दौरान जब पारस ने नीतीश की तारीफ की तो चिराग ने उन्हें पार्टी से निकालने की धमकी दी. राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी आम थी कि तब पशुपति और चिराग के बीच तीखी नोकझोंक भी हुई. जाहिर है सियासत के मास्टर सीएम नीतीश कुमार ने इस स्थिति को भांप लिया कि चिराग पासवान भले ही विरासत के बूते पार्टी नेतृत्व पर काबिज हैं, लेकिन उनमें सियासत को समझने-बूझने और करने की काबिलियत अभी आनी बाकी है.
बागी हुए चिराग के चाचा को मिला 4 सांसदों का साथ
प्रेम कुमार कहते हैं कि बाद में नीतीश ने चिराग को धीरे-धीरे लोजपा से अलग करने की योजना बनाई और पहले इकलौते विधायक को जदयू में शामिल किया. फिर 200 पदाधिकारियों को जदयू की सदस्यता दिलाई. इसके बाद अपने दो विश्वस्तों महेश्वर हजारी (पशुपति पारस के रिश्ते में ममेरा भाई हैं) और ललन सिंह को चिराग को संसदीय दल में भी अलग-थलग करने की जिम्मेदारी दी. दोनों ने ही ऑपरेशन को बखूबी अंजाम दिया और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान को अलग-थलग करते हुए उनके चाचा पशुपति पारस के नेतृत्व में चार सांसदों ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया.
नीतीश के मास्ट्रस्ट्रोक से धराशायी हुए चिराग पासवान
प्रेम कुमार कहते हैं कि इसमें नीतीश कुमार के करीबी आरसीपी सिंह ने भी अपने राजनीतिक कौशल का परिचय दिय. इसके बाद जितनी चिराग पासवान की अनुभवहीनता की भूमिका रही उससे ज्यादा नीतीश कुमार की सियासी हुनर का रोल है. चिराग पासवान अपनी आत्ममुग्धता में रहे कि पीएम मोदी का हनुमान कहने भर से ही भाजपा उन्हें बचा लेगी, लेकिन नीतीश के सामने एक न चली. रामविलास पासान के निधन के सिर्फ 8 महीने बाद ही पार्टी टूट गई.
चिराग पासवान की हैसियत को लेकर उठ रहे सवाल
इसकी वजह रामविलास पासवान के छोटे भाई और पार्टी के सांसद पशुपति पारस की बगावत रही. लोक जनशक्ति पार्टी के चार सांसद चंदन सिंह, वीणा देवी, महबूब अली कैसर और प्रिंस राज ने सांसद पशुपति पारस को लोक जनशक्ति पार्टी संसदीय दल का नेता चुन लिए गए और चिराग पासवान अलग-थलग पड़ गए. अब आने वाले समय में क्या होगा यह अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि लोजपा का नेतृत्व अब चिराग पासवान के हाथ में नहीं रहने जा रहा है.
नीतीश कुमार की एक रणनीति यह भी
अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि दूसरी स्थिति यह हो सकती है कि अगर लोजपा के बागी गुट, यानी पशुपति नाथ पारस के नेतृत्व में सभी पांचो सदस्य जदयू में शामिल हो जाएं तो नीतीश कुमार के सांसदों की संख्या भाजपा के 17 सांसदों की संख्या से बढ़कर 21 हो जाएगी और केंद्रीय मंत्रिमंडल में अपनी अधिक हिस्सेदारी पेश कर पाएगी. ऐसे भी हाल में ही जदयू ने समान बंटवारे का सवाल उठाते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल में 5 सीटों पर दावेदारी की है.
यहीं नहीं थमेगा नीतीश कुमार का अभियान
प्रेम कुमार कहते हैं कि विधानसभा चुनाव में लोजपा के कारण जदयू के तीसरे नंबर पर पहुंचने के बाद से नीतीश कुमार को यह बर्दाश्त नहीं है. तमाम दबाव भी झेल रहे हैं और कई बार छोटे भाई की भूमिका में असहज भी दिखते हैं. भाजपा-जदयू नेताओं के बीच बयानबाजियों पर भी वे काफी कुछ कहने की स्थिति में नहीं दिखते हैं. ऐसे में सीएम नीतीश कुमार देर सबेर फिर से गठबंधन में बड़े भाई की भूमिका में आना चाहते हैं. यही वजह है कि उनका अगला टारगेट कांग्रेस पार्टी के विधायक माने जा रहे हैं जिन्हें वे अपनी पार्टी में मिलाने की कोशिश में हैं. अब इसमें वे कितने सफल होते हैं यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन अगर कांग्रेस के कुछ विधायक उनके साथ आते हैं तो उनकी भूमिका बड़े भाई की तो नहीं होगी, लेकिन ताकत जरूर बढ़ जाएगी.





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