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चिराग पासवान की जिद या कुछ और? जानें रामविलास पासवान के नि’धन के 1 साल के भीतर कैसे टू’टी LJP

पटना. चिराग पासवान की अगुवाई वाली लोक जनशक्ति पार्टी (Lok Janshakti Party) बिहार में एक बार फिर से टूट का शिकार हुई है. दरअसल, बिहार विधानसभा चुनाव के बाद यह दूसरा मौका है जब पार्टी के नेता ही अपने सुप्रीमो का साथ छोड़कर दूसरे दल में जा मिले हैं. बिहार विधानसभा चुनाव से पहले चिराग पासवान (Chirag Paswan) के बगावती तेवर का खामियाजा उनकी पार्टी को बखूबी उठाना पड़ा था और यही कारण है कि विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद से ही पार्टी में असंतोष के स्वर फूट गए थे, ऐसे में रविवार की देर शाम हुई सियासी हलचल से यह साफ हो गया कि पार्टी के 6 में से 5 सांसदों ने चिराग को अपना नेता मानने से इनकार कर दिया है.

पार्टी में हुई बगावत के बाद जहां सभी नेताओं ने चिराग पासवान के चाचा पशुपति कुमार पारस को अपना नेता मान लिया है, तो वहीं दूसरी ओर उनके जेडीयू में भी जाने प्रबल संभावना बन गई है. इससे पहले पार्टी के एकमात्र विधायक (बेगूसराय की मटिहानी सीट से चुनाव जीते थे) भी चिराग के फैसले और नीतियों का विरोध करते हुए जेडीयू में शामिल हो गए थे. माना जा रहा है कि बागियों का नेतृत्व करने वाले चिराग पासवान के चाचा पशुपति कुमार पारस इस मसले को लेकर सोमवार को सार्वजनिक तौर पर बात करेंगे. सबसे अहम सवाल यह उठ रहा है कि आखिर रामविलास पासवान की मौत के एक साल के कम समय में ही पार्टी कैसे टूट गई?अब जरा बात करें रामविलास पासवान के निधन की. पूर्व केंद्रीय मंत्री और लोजपा के संस्थापक रामविलास पासवान ने पिछले साल 8 अक्टूबर को लंबी बीमारी के बाद दिल्ली के एक अस्पताल में दम तोड़ दिया था. इसके बाद पार्टी की कमान चिराग पासवान के हाथ में आ गई थी, लेकिन इसके बाद से जो हालात बने उससे पार्टी लगातार टूटटी ही रही. चिराग के बागी तेवर और नीतीश कुमार से उनकी सियासी दुश्मनी का खामियाजा बिहार विधानसभा चुनाव में उनको उठाना पड़ा.

बिहार विधानसभा चुनाव में 143 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली एलजेपी महज 1 सीट जीत पाई. पार्टी में जारी असंतोष का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि महिटानी के विधायक राजू सिंह को भी चिराग पासवान नहीं रोक सके और वह जेडीयू में शामिल हो गए. विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद तो लोजपा में जैसे घमासान सा मच गया. विरोध और असंतोष के स्वर के साथ चुनाव परिणाम के बाद कई जिलाध्यक्ष समेत 200 से ज्यादा नेता एलजेपी छोड़कर जेडीयू में शामिल हो गए थे. पार्टी को विधानसभा चुनाव में मिली हार की फिराक का मानों जेडीयू को इंतजार ही था. यही कारण रहा कि ताजा हालात यानी पार्टी के सांसदों को तोड़ने के पीछे भी जेडीयू के ही एक कद्दावर नेता का हाथ बताया जा रहा है.

इस बात के संकेत तभी मिल गए थे जब पार्टी के सांसदों में टूट की बात सामने आई थी, लेकिन तब मामला दब गया था. उस वक्त भी बागी सांसदों का नेतृत्व पशुपति कुमार पारस ही कर रहे थे. ये भी माना जा रहा है कि पार्टी में असंतोष की एक वजह रामविलास पासवान के निधन के बाद उनके राजनीतिक विरासत को कब्जे को लेकर परिवार का अंदरूनी विवाद भी था. हालांकि, तब अपने लेटर हेड पर इन चर्चाओं का खंडन कर पारस ने इस मामले पर विराम लगा दिया था.

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