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वट सावित्री व्रत पर पटना के 400 साल पुराने बरगद पेड़ की परिक्रमा करने पहुंची महिलाएं, जानें इतिहास

प्राचीन व ऐतिहासिक गुरु की नगरी पटना साहिब में कई प्राचीन बरगद के पेड़ हैं। कुछ लगाए गए हैं और कुछ अपने आप ही उगे। तख्त श्री हरिमंदिर साहिब पटना साहिब व सिद्धपीठ छोटी पटनदेवी मार्ग के बीच में स्थित काली स्थान मोहल्ले में स्थापित लगभग तीन हजार वर्ष प्राचीन काली मंदिर के बाहर लगभग 400 वर्ष पुराना बरगद का पेड़ भक्तों की आस्था का केंद्र है।

कोरोना को भूल महिलाएं ने की पेड़ की परिक्रमा

गुरुवार की भोर से यहां सैकड़ों महिलाएं पूजन सामग्री के साथ पहुंचकर वट सावित्री की पूजा की। हर घंटे पर लगभग 100 से अधिक महिलाओं ने पहुंचकर माता सावित्री और सत्यवान की पूजा की। जल से वटवृक्ष को सींचकर कच्चा धागा वटवृक्ष के चारों ओर लपेट कर परिक्रमा की। 

पांच से अधिक पीढ़ियों से महिलाएं करती आ रहीं पूजा

50 वर्षीय पंडित शशिकांत मिश्र की मानें तो उनके दादा के दादा भी कहते थे कि इस बरगद के पेड़ को वे जन्म से ऐसे ही देखते आ रहे हैं। पुजारी बताते हैं कि मान्यता के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को वट सावित्री व्रत रखने से पति की अकाल मृत्यु टल जाती है। 84 वर्षीया मिथिलेश कुमारी बताती है कि कई वर्षों से वट सावित्री का व्रत रखी। मेरी सास के बाद मैं और मेरे बाद 35 वर्षों से मेरी बहू प्राचीन बरगद की प्रेड़ की पूजा करते आ रही है। कई महिलाओं ने बताया कि पांच से अधिक पीढ़ी इस वट वृक्ष की पूजा-अर्चना कर चुकी हैं। बरगद पेड़ के आसपास छोटे-छोटे बच्चे पांच-पांच रुपये में बरगद की डाली बेचते दिखे। वहीं आसपास में बैलून बेचनेवाले भी पहुंचे।

पुजारी बताते हैं कि पुरातन मान्यता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व यह कालीमंदिर गंगा व सोन नदी के संगम पर बसा था। मां काली मंदिर शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर में आदिशक्ति के रूप में मां काली की सैकड़ों वर्ष प्राचीन काले पत्थर की प्रतिमा है। इसे लोग श्मशान काली भी कहते हैं। निर्जन क्षेत्र होने के कारण मंदिर में तांत्रिकों का जमावड़ा रहता था। नदी के दूर जाने से धीरे-धीरे मोहल्ले में आबादी बढ़ती गई। आज यह मोहल्ला काली स्थान के नाम से विख्यात है।

श्रद्धालु छांव का लेते हैं आनंद

काली मंदिर के बाहर स्थित बरगद के पेड़ के नीचे चबूतरा पर बैठकर बड़ी संख्या में श्रद्धालु छांव का आनंद लेते हैं। मंदिर में पूजा कर निकलने वाले भक्त भी थोड़ा देर पेड़ की छांव में चबूतरे पर बैठ राहत की सांस लेते हैं।

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