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मुजफ्फरपुर : कोरोना व मौसम की मार से इस बार लीची व्यापार काे लगी चपत, कुछ फल बागाें में झड़ गए ताे कुछ में लग गए कीड़े

एक ताे कोरोना संक्रमण का दाैर, उस पर मौसम की मार से इस बार लीची किसान व व्यापारियाें काे बड़ी चपत लगी। जिले से हर साल लीची का औसतन 100 कराेड़ का व्यापार हाेता रहा है। लेकिन, इस वर्ष आधी कमाई भी नहीं हाे सकी। एक ताे फल तैयार होने के ऐन वक्त पर ही लॉकडाउन लगने के कारण बाहर से बड़े व्यापारी नहीं अाए। दूसरा तुड़ाई के समय ही यास चक्रवात में आंधी के साथ हुई भारी बारिश के कारण फल या ताे बगीचे में ही झड़ गए, अथवा उनमें कीड़े लग गए। वैसे उसके पहले भी लगातार हुई बारिश के कारण अन्य वर्ष की अपेक्षा लीची लेट से तैयार हुई। ऐसे में लीची व्यापार औधे मुंह गिर गया। किसान व बाग खरीदनेवाले स्थानीय व्यापारियाें काे भारी नुकसान झेलना पड़ा। किसानाें का कहना है कि वे 26 से 30 मई तक तैयार लीची को भी नहीं तोड़ पाए। उसके बाद आसमान साफ हुआ ताे लीची काली होकर झड़ने लगी।

हवा में अत्यधिक नमी व लगातार बारिश के कारण फल में कीड़े भी लग गए। कई किसानाें ने कहा कि कोरोना संक्रमण के दौरान भी उन्हाेंने बागों की पूरी देखभाल की। समय से सिंचाई के साथ जरूरी दवाओ का छिड़काव किया। लेकिन, ऐन माैके पर काेराेना संक्रमण, लॉकडाउन व मौसम की मार से सब बेकार साबित हुआ।

लीची उत्पादक भोलानाथ झा ने बताया कि महानगर और बाहर के व्यापारियाें के नहीं आने से स्थानीय व्यापारियों ने खरीदे गए बाग भी छोड़ दिए। मीनापुर के लीची व्यापारी मनोज कुमार ने कहा कि शाही के साथ चाइना लीची में भी कीड़े लग गए। लीची उत्पादक संघ के अध्यक्ष बच्चा प्रसाद सिंह ने कहा कि लीची कई जिलाें का इकलाैता कैश क्रॉप है। मुजफ्फरपुर जिले से हर साल 100 करोड़ से अधिक का लीची काराेबार हाेता है। लेकिन, इस बार अधिकतर किसानों के लिए सिंचाई व दवा छिड़काव में खर्च राशि निकलनी भी मुश्किल हाे गई है।

लीची की गुणवत्ता कमतर : इसलिए लीचीका इंटरनेशनल का ताला तक नहीं खुला
स्थिति यह हो गई कि इस वर्ष प्रसिद्ध पल्प व जूस उत्पादक कंपनी लीचीका इंटरनेशनल समेत कई अन्य छोटी कंपनियों के ताले तक नहीं खुल सके। लीचीका इंटरनेशनल के प्रोपराइटर केएन ठाकुर एक जून को मुंबई से मुजफ्फरपुर आए। उन्होंने कहा कि बागों की स्थिति व लीची की क्वालिटी काे देखते हुए फैक्टरी खाेलना मुश्किल था। दो वर्षों से लीची के सीजन में ही लॉकडाउन हाे जाने के कारण पिछले वर्ष का लीची पल्प भी अब तक नहीं बिक सका है। यदि चाइना लीची कुछ बेहतर मिली ताे ही पल्प का उत्पादन करेंगे।

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