मुसहरों की स्थिति दलितों में सबसे खराब मानी जाती है। गरीबी और लाचारी ऐसी कि ये अक्सर चूहा, घोंघा, सितुआ खाकर अपना जीवन चलाते हैं। इस कोरोना में जहां पटना में बड़ी संख्या में लोग कोविड के शि’कार हुए और मौ’तें भी हुईं, वहीं दूसरी तरफ मुसहरों में मौत की सूचना नहीं है। हद यह कि वे वैक्सीन लेने को हरगिज तैयार नहीं। कहते हैं कि वैक्सीन लेने पर उन्हें बुखार हो जाएगा और मर जाएंगे। वे ऐसे ही ठीक हैं। बल्कि उनको इस बात से काफी गुस्सा आया कि हम क्यों उनसे यह पूछने उनके घर पर पहुंच गए कि वैक्सीन क्यों नहीं ले रहे हैं।
8 महिलाओं में से कोई परिवार को या खुद को वैक्सीन लगवाने को तैयार नहीं
आशियाना मोड़ पर मुसहरों के लिए भवन लालू-राबड़ी शासन काल में बना था। उसका ऊपरी तल्ला जर्जर हो चुका है। नीचे कचरा के बीच जिंदगी है, लेकिन घरों में टीवी लगे हैं। बातचीत में महिलाएं कहती हैं कि हमलोग आराम से कमा-खा रहे हैं। वैक्सीन क्यों लेंगे मरने के लिए? आप ही लीजिए जाकर…। दूसरी महिला कहती है, जाइए आगे बढ़िए…ना…। तीसरी महिला कहती है…. काहे के लिए सूई लेंगे.. मरने के लिए…? चौथी महिला पूछने पर कहती हैं कि हां टीका ले लिए…। लेकिन बातचीत में उनका झूठ पकड़ा जाता है. वह कहती हैं कि हमलोग ई सब नहीं मानते हैं टीका-वीका…। पांचवीं महिला कहती है.. हम टीका नहीं लेंगे… भगवान है जिलाने वाला और बचाने वाला… भूख से मर रहे हैं तो सरकार आ ही नहीं रही है और चले हैं टीका लगवाने..। छठी महिला तो इस पर कुछ बात ही करना चाहती… वह उठकर चली जाती हैं। सातवीं महिला कहती है कि… टीका लगाने से क्या होगा.. कुछ नहीं होगा… हमलोग नहीं लेंगे टीका…। एक आठवीं महिला ने हमें देखा तो लगी भाषण देने…कहने लगी… शराब पीने वाले….सूअर खाने वाले को कोरोना होता है कहीं…. कोई टीका नहीं लेगा यहां…।
दलितों की इसी छोटी सी कॉलोनी में रहने वाले एक व्यक्ति ने कहा- हमलोग वैक्सीन नहीं लेते हैं… हमलोग मास्क भी नहीं लगाते हैं… लॉकडाउन लगाकर सरकार हमलोगों को मुआ रही है…. टीका लगाने से बुखार लग जाएगा तो कमाएंगे- खाएंगे क्या?
दीघा विधायक पास में ही रहते हैं
पिछले साल पटना में इसी कॉलोनी के पास वाले इलाके खाजपुरा से पटना में कोरोना की शुरुआत हुई थी। आशियाना मोड़ से लेकर खाजपुरा तक प्रशासन ने बेली रोड को सील कर दिया था। अब जब वैक्सीन आ गया है, तब मुसहरों के बीच जागरुकता का यह हाल चौंकाने वाला है। उन्हें सिस्टम या सरकार पर कोई भरोसा नहीं है। कोई संस्था या सरकार का कोई अफसर इन्हें समझाने नहीं आ रहा। बगल में दीघा के विधायक संजीव चौरसिया का घर है।
मुसहरों के लिए काम करने पर पद्मश्री पाने वाली सुधा वर्गीज भी इस रवैये से हैरान
मुसहरों के लिए पटना में पिछले 35 साल से काम रहीं सुधा वर्गीज भी इस रवैये से हैरान हैं। सुधा वर्गीज ने समाज के सबसे निचले पायदान वाली जाति के बीच कार्य करने की ठानी और इसके लिए उन्हें पद्मश्री पुरस्कार मिला है। वह कहती हैं कि अभी तक किसी मुसहर को कोविड महामारी होते उन्होंने नहीं देखा है। लेकिन वह यह भी कहती हैं कि यह खतरनाक स्थिति है कि कोई मुसहर वैक्सीन लेने को तैयार नहीं है।
कहती हैं कि वे मुसहरों के 200 गांवों में एक्टिव हैं, सभी जगह यही स्थिति है कि वे वैक्सीन के लिए तैयार ही नहीं हैं। लोग न मास्क लगाते हैं, न कोई सोशल डिस्टेंसिंग है, न हाथ धोना है। कहती हैं कि मुसहर कई तरह के नॉनवेज खाते हैं। इनमें प्रमुख हैं- चूहा, मेढ़क, सितुआ, घोंघा आदि। इन सभी में इम्युनिटी बढ़ाने की क्षमता खूब है। ये जाति अंदर से मजबूत है। बताती हैं कि कई बस्तियों में लोगों को जागरुक करने की कोशिश की, लेकिन लोग कहते हैं- छोड़िए दीदी कोई और बात कीजिए, टीका नहीं लगवाएंगे।
पटना में 3 लाख मुसहर रहते हैं
सुधा वर्गीज बताती हैं कि पटना जिला में मुसहरों की संख्या 3 लाख है। बिहार में ये 10 लाख की संख्या में हैं। इनकी स्थिति सुधारने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को भी सुझाव दिए थे, पर सरकार ने कुछ किया नहीं। ये अभी भी काफी अशिक्षित हैं और अपने तरीके से सोचते हैं। सरकार इन्हें शराब के कारोबार से अब तक नहीं निकाल सकी है। शायद ही इनकी कोई बस्ती होगी, जहां शराब न हो।





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