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मो. शहाबुद्दीन की मौ’त पर क्यों याद आ रहे चंदा बाबू! पढ़ें ‘साहेब’ के सलाखों के पीछे जाने की कहानी

पटना/सीवान. बिहार के बाहुबली व सीवान के पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन (Mohammed Shahabuddin) का निधन कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण हो गया. कहा जाता है कि एक दौर में खौफ का दूसरा नाम शहाबुद्दीन था. उस दौर के लोगों यह बात बड़ी शिद्दत से याद है कि सीवान की धरती पर शहाबुद्दीन का नाम लेना गुनाह माना जाता था. उनका उपनाम ‘साहेब’ था. शहाबुद्दीन को ‘सीवान के साहेब’ कहलाना बेहद पसंद था. पर आज उस व्यक्ति को भी याद करना बेहद आवश्यक है जिसने सीवान की धरती के इस खौफ का खात्मा करने में अहम योगदान दिया. भले ही उन्होंने अपने तीन बेटों को खो दिया, लेकिन वे अड़े रहे और सीवान के साहेब को तिहाड़ जेल की ऐसी यात्रा करवाई कि वहां से उनकी मौत की खबर ही बाहर आई. जीहां, हम बात कर रहे हैं खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने वाले और उन्हें तिहाड़ जेल पहुंचाकर दम लेने वाले चंदेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू (Chandeshwar Prasad alias Chanda Babu) की.

चंदा बाबू ने भी दिसंबर 2020 के में ही दुनिया को अलविदा कह दिया था पर मरते-मरते भी उनकी बेखौफ आंखों में न्याय का संघर्ष और उसके फलस्वरूप मिली जीत की चमक देखी जा सकती थी. दरअसल सीवान में हुए चर्चित तेजाब कां’ड के खि’लाफ चंदा बाबू ने लड़ाई लड़ी थी, जिसके बाद शहाबुद्दीन पर एक्शन हुआ था. चंदा बाबू की जिंदगी बेहद दर्दभरी रही. शहर के प्रसिद्ध व्यवसायी चंदा बाबू ने सीवान के बहुचर्चित तेजाब हत्याकांड मामले में अपने दो बेटों को खो दिया था, जबकि तीसरे बेटे की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. इसी तेजाब हत्याकांड के मुख्य गवाह चंदा बाबू ही जिंदा बचे थे. उन्होंने अपने बेटों की हत्या के आरोपित शहाबुद्दीन के ि‍खिलाफ कानून लड़ाई लड़ कर पूर्व सांसद को तिहाड़ जेल भिजवाया.

शहाबुद्दीन पर लगे थे चंदा बाबू के बेटों को तेजाब से मारने के आरोप
चंदा बाबू सीवान के जाने-माने व्‍यवसायी थे. वर्ष 2004 में जब कुछ बदमाशों ने उनसे रंगदारी मांगी थी, तो उन्होंने देने से इनकार कर दिया था. चंदा बाबू के इस इनकार के बाद उनके जीवन में सबकुछ बदल गया. दरअसल, जब बदमाशों ने रंगदारी मांगी, तो चंदा बाबू का बेटा दुकान पर था. चंदा बाबू के तीन बेटों गिरीश, सतीश और राजीव का अपहरण कर लिया गया. इसी बीच चंदा बाबू के बेटों की बदमाशों से कहासुनी हुई और बदमाशों ने चंदा बाबू के दोनों बेटों पर तेजाब डाल दिया.

चंदा बाबू-शहाबुद्दीन के बीच चली कानूनी लड़ाई में हार गया बाहुबली
बदमाशों ने गिरीश और सतीश को तेजाब से नहला कर मार दिया था, जबकि इस मामले का चश्मदीद चंदा बाबू का छोटा बेटा राजीव किसी तरह बदमाशों की गिरफ्त से अपनी जान बचाकर भाग निकला. इस तेजाब हत्याकांड में पूर्व बाहुबली सांसद मो शहाबुद्दीन का नाम आया था. इसी के बाद चंदा बाबू ने शहाबुद्दीन के खिलाफ कानूनी लड़ाई की शुरुआत की थी, जो 2004 से शुरू होकर लंबे वक्त तक चली.


चंदा बाबू को सबने दी थी सीवान छोड़ने की सलाह, पर वह डटे रहे
जानकार लोग बताते हैं कि वर्ष 2004 में जब घटना घटी थी तो चंदा बाबू पटना गए हुए थे. शुभचिंतकों ने चंदा बाबू को बार-बार कहा कि वे सीवान न आएं, नहीं तो उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया जाएगा. बेटों की मौत के बाद चंदा बाबू किसी तरह सीवान पहुंचे. इंसाफ के लिए एसपी की चौखट पर गए, लेकिन मिलने नहीं दिया गया था. थक हारकर चंदा बाबू थाने पहुंचे तो वहां दारोगा ने कहा कि आप फौरन सीवान छोड़ दीजिए. तब अफसरों से लेकर नेताओं तक की चौखट छान ली थी, लेकिन किसी ने मदद नहीं की. बावजूद इसके चंदा बाबू ने हार नहीं मानी.

चंदा बाबू ने मो. शहाबुद्दीन को सलाखों के पीछे पहुंचा कर ही लिया दम 
चंदा बाबू के तीसरा बेटा राजीव भाइयों के तेजाब से हुई ह”त्याकां’ड का गवाह बना था, लेकिन 2014 में सीवान शहर के डीएवी मोड़ पर उसकी भी गोली मार कर ह’त्या कर दी गई. गौरतलब है कि हत्या के महज 18 दिन पहले ही राजीव की शादी हुई थी. इतने जुल्मोसितम के बाद भी चंदा बाबू व उनकी पत्नी अपने एक अपाहिज बेटे के साथ सीवान में डटे रहे और बाहुबली से लंबी लड़ाई लड़ी और शहाबुद्दीन को सलाखों के पीछे पहुंचा कर ही दम लिया.

नीतीश सरकार की सख्ती से ही अंजाम तक पहुंच पाई न्याय की लड़ाई 
बता दें कि जिस दौर में यह बहुचर्चित तेजाब कांड हुआ था उस वक्त बिहार में लालू-राबड़ी का शासनकाल था और बिहार में बाहुबलियों का दबदबा था. उस दौर में तब शहाबुद्दीन के नाम से पूरा इलाका कांपता था. तब शहाबुद्दीन को सभी ‘साहेब’ कहकर बुलाते थे. वर्ष 2005 में सत्ता में आने के बाद नीतीश सरकार ने शहाबुद्दीन पर कार्रवाई शुरू की. चंदा बाबू भी करीब डेढ़ दशक तक मोहम्मद शहाबुद्दीन से लड़ते रहे और पूर्व बाहुबली सांसद को सलाखों के पीछे पहुंचाने में कामयाब रहे.

बाहुबली को हराकर चंदा बाबू भी जिंदगी की जंग हार गए
शहाबुद्दीन ने चंदा बाबू की हंसती खेलती दुनिया उजाड़ दी थी. डरी-सहमी चंदा बाबू की पत्नी, दोनों बेटियां और एक अपाहिज बेटा भी घर छोड़कर जा चुके थे. सारा परिवार बिखर चुका था. तीसरे बेटे को भी मार दिया गया था. हालांकि, अपने बेटों के लिए न्याय की इस लड़ाई में उनकी पत्नी भी कभी मौत के सामने झुकी नहीं. कुछ महीने पूर्व पत्नी की मौत के बाद चंदा बाबू अकेले हो गए थे और 16 दिसंबर, 2020 को अचानक जिंदगी से जंग हार गए. अब तो शहाबुद्दीन भी इस दुनिया से चले गए, लेकिन सीवान के साहेब के खौफ की कहानी और चंदा बाबू के संघर्ष की दास्तां दशकों तक लोगों की जेहन में जिंदा रहेंगे.

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