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बु’खार होगा तो कहीं म’र तो नहीं जाएंगे, एक छींक आई कोरोना तो नहीं हो गया, जानें अपने हर सवाल का जवाब

देश और दुनिया में आई कोरोना संक्रमण की दूसरी ‘लहर की त्रासदी अब लोगों के जहन तक उतर चुकी है. आलम यह हैं कि लोग संक्रमण से कम घब’राहट और बेचैनी से ज्यादा गंभीर हो रहे हैं. स्थिति यह भी बन रही हैं कि ऑक्सीजन लेवल कम होने से मरीज लेकर बेड की तलाश में लोग निकल रहे हैं और बेड नहीं मिलने से मरीज की स्थिति और गंभीर हो जाती है. आखिर क्यों बनी ऐसी स्थिति? क्या हैं इसके बुरे परिणाम और कैसे बचा जाए? जानें हर सवाल का जवाब

क्या है स्थिति और क्या कहते हैं डॉक्टर?

कोरोना के इस त्रासदी के बीच अस्पताल की बदतर व्यवस्थाओं की तस्वीरें, मर्चुअरी में लाशों का ढ़ेर, श्मशान में जलती चिताएं और अंतिम संस्कार के लिए लंबी कतार, दवाइयों के लिए मारपीट और ना जाने ऐसे कितनों ही नकारात्मक तस्वीरें देख देख कर मन विचलित सा होने लगा है. ऐसी तस्वीरों का सीधा असर लोगों के मनोस्थिति पर पड़ रहा है और बिगड़ते मनोस्थिति के कारण संक्रमित व्यक्ति गंभीर तो सामान्य व्यक्ति मन ही मन खुद को संक्रमित मानने लगा है. ऐसी स्थिति को लेकर शहर के युवा होम्योपैथी चिकित्सक डॉ उत्कर्ष त्रिवेदी कहते हैं कि कोरोना को सबसे पहले मन से निकालना पड़ेगा. बिना मन से निकाले कोरोना कभी समाप्त नहीं हो पाएगा, साथ ही यह भी कहते हैं कि सामान्य सर्दी, खांसी, छीक और बुखार कभी भी किसी को भी हो सकता है. इसे कभी रोका नहीं जा सकता है, लेकिन हमें समझाना होगा कि हर सर्दी-खांसी या बुखार कोरोना नहीं होता है.
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आज लोगों के मन में डर बैठ गया है, लोग ऐसा मानने लगे हैं कि कहीं उन्हें कोरोना तो नहीं हो गया है. लोगों को एख छींक आई या 99 ट्रेमपरेचर हुआ तो वो सोचते हैं कि कहीं उन्हें कोरोना तो नहीं हो गया है. लूज-मोशन, आंख लाल होना कोई नई बात नहीं है, यह पहले भी हो चुका है, इससे पहले भी निजात पाई जा चुकी है. आज भी निजात पाई जा रही है, संक्रमण बढ़ने की सबसे बड़ी वजह लोगों की मानसिक स्थिति है. पहले का बुखार 3 से 5 दिन में ठीक होता था. आज का बुखार 8 से 10 दिनों में ठीक हो रहा है. मगर लोग तनाव, टेंशन और डिप्रेशन में जी रहे हैं, जो लोगों के भीतर जीने की इच्छा को कम रहा है. लोगों के मन में भय इस कदर हावी हो चुका कि उन्हें ऐसा लगता हैं कि उन्हें बुखार होगा तो कहीं वे मर तो नहीं जाएंगे, आज जहां एक हजार लोगों में 02 की मौत हो रही है तो 998 ठीक भी तो हो रहे हैं. हमें उस पहलु पर फोकस करना होगा.

खुद डॉक्टर ना बने डॉक्टर की सुनें:-

बीते एक सालों से चल रहे कोरोना संक्रमण के बीच लोग खुद ही डॉक्टर बने हुए हैं. मसलन यह कि खुद ही दवाई ले रहे हैं. खुद ही उपाय करने में जुटे हुए हैं, इस स्थिति को लेकर के शहर के युवा होम्योपैथी चिकित्सक डॉ उत्कर्ष त्रिवेदी कहते हैं कि इस तरह के वायरस आते रहते हैं डेंगू, मलेरिया, चिकन गुनिया, बर्डफ्लू, स्वाइन फ्लू और अब कोरोना, किसी भी वायरस में प्रिकॉशन कुछ समय के लिए होता है. पंद्रह दिन या एक महीना मगर यहां स्थिति ऐसी हैं कि बीते एक साल से लोग खुद ही डॉक्टर बने हुए हैं. स्थिति यह हैं कि लोग बिना कारण भाप ले रहे हैं, रोज काढ़ा पी रहे हैं, घरेलु उपाय कर रहे हैं, मेडिकल से लेकर जिंक, विटामिन की गोलियां खा रहे हैं. इससे उनके डायजेशन सिस्टम पर विपरित असर पड़ रहा है, लोगों को इस बात को समझना होगा कि समान से समान की चिकित्सा की जाती है मतलब जिससे आया है उससे ही जाएगा और अगर उसी चीज को ज्यादा लेंगे तो बीमारी वापस ही आएगी. लोगों के अत्यधिक प्रिकॉशन और प्रवेंटिव उपाय करने से आज दवाएं धीरे असर कर रही है. बॉडी में दवाओं का कैमिकल रिएक्शन के कारण बेचैनी और असहनी दर्द हो रहा है, जिससे लोग घबराए हुए हैं. इसलिए जब जरूरत हो तभी प्रिकॉशन लेना चाहिए, जिसे जरूरत वही भाप ले काढ़ा पीए और सबसे जरूरी एक समय में एक ही ट्रिटमेंट पर फोकस करें. जल्दी ठीक होने के चक्कर में लोग सभी तरह के उपाय एक साथ कर रहे हैं जिससे परेशानी और अधिक बढ़ रही है.

घबराना नहीं लड़ना और जीतना होगा:-
कोरोना संक्रमण के मौजूदा स्थिति में लोगों के मन में घबराहट ज्यादा हो रही है, लोग बेचैन हो रहे हैं जिस पर होम्योपैथी चिकित्सक डॉ उपेंद्र त्रिवेदी कहते हैं कि सबसे पहले हमे अपने मन से भय को समाप्त करना होगा. जब तक लोगों के मन से भय नहीं निकलेगा कोरोना समाप्त नहीं होगा, साथ ही कहते हैं कि आज की स्थिति ऐसी हैं कि मरीजों से कोई बात तक नहीं कर रहा है. कोई उसका साथ नहीं दे रहा है, घरों में कैदी की तरह रहने के लिए मजबूर है जिससे मरीज के मन में तनाव लगातार बढ़ते जा रहा है और तनाव की वजह से मरीज गंभीर हो रहा है. ऐसी स्थिति में हम सब को आपतकाल में भी हिम्मत से साथ काम करना होगा. मानस‍िक रूप से कोविड से दूरी बनाना होगा, न्यूज चैनल, मीडिया हाउस, सोशल मीडिया के नकारात्मक माहौल को समाप्त करना होगा, जो लोग ठीक हो रहे हैं उन्हे प्रचारित करना होगा. उनके अनुभव को बताना होगा जिससे लोगों की मनोदशा बेहतर बनी रही.

आपतकाल में यह काम बिल्कुल ना करें:-
डॉ उत्कर्ष त्रिवेदी कहते हैं कि आज जब मरीज की स्थिति बिगड़ रही है तो परिवार के लोग उसे उसी स्थिति में साथ ले जाकर अस्पतालों में बेड की तलाश करते हैं और अगर बेड नहीं मिलता है तो मरीज तनावग्रस्त हो जाता है, जिससे उसकी हार्ट बीट तेज हो जाती है और ऑक्सीनज लेबल कम हो जाता है, इसलिए जब भी ऐसी स्थिति बने तो सबसे पहले परिवार के सदस्यों को साथ रहना होगा. घर का माहौल अच्छा करना होगा. मरीज को खुले हवा में बैठाना होगा, प्रिवेंटिव दवाओं के साथ परिवार के दूसरे सदस्य को अस्पताल में बेड की व्यवस्था करने कि लिए जाना चाहिए.

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