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शहीद पिता को एकटक ताकती रही 4 साल की बिटिया

तिरंगे से लिपटे एक ताबूत पर चस्पा की गई रमेश कुमार जुर्री की तस्‍वीर को 4 साल की मासूम सेजल एकटक देखे जा रही थी. सैकड़ों की संख्या में मौजूद ज्यादातर लोगों की आखें नम थीं. कुछ का तेज आवाज में रो-रो कर बुरा हाल था. इन सबके बीच सेजल की निगाहें सबकी ओर देखने के बाद फिर से ताबूत पर चस्पा फोटो पर टिक जाती हैं. उसकी आखों में आंसू नहीं थे, लेकिन सवालों की लंबी फेहरिस्त देखी और पढ़ी जा सकती थी. मसलन उसके पापा जो 3 दिन पहले तक उसके साथ थे, अब सिर्फ उनकी तस्वीर ही जगह-जगह क्यों नजर आ रही है? जिस तीन रंगों वाले कपड़े के पास (जहां पापा की तस्वीर चस्पा है) लोग फूल क्यों चढ़ा रहे हैं? मम्मी, दादी, चाचा और दूसरे लोग इतना रो क्यों रहे हैं? जो कपड़ा (वर्दी) पहन पापा अक्सर बाहर जाते थे, उन्हीं कपड़ों को पहने कई लोग दिख रहे हैं, लेकिन पापा नजर क्यों नहीं आ रहे हैं? ये दृष्य छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 100 किलोमीटर दूर कांकेर जिले के पंडरीपानी गांव के स्कूल मैदान का है.

बस्तर संभाग के बीजापुर जिले के तर्रेम थाना क्षेत्र में बीते 3 अप्रैल को सुरक्षा बल और न’क्सलियों के बीच हुई मुठभे’ड़ में जिन 22 जवानों की शहादत हुई, उनमें पंडरीपानी गांव के डिस्ट्रिक्ट रिज़र्व गार्ड के प्रधान आरक्षक (35 साल) रमेश कुमार जुर्री भी थे. सोमवार की सुबह करीब 10 बजे जब हम वहां पहुंचे तो गांव में सन्नाटा पसरा था. पूछने पर साइकिल से जा रही करीब 10 साल की लड़की ने हमें एक गली की ओर इशारा किया, जहां कुछ पुलिसवाले भी नजर आए. द्वार पर टेंट लगाया जा रहा था.

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पिता की कब्र के बगल में बेटे की क’ब्र की खुदाई करता शख्स


पिता के बगल में ही अंतिम संस्कार
घर से ही लगे खेत में एक मूर्ति के बगल में लोग गड्ढा खोदते नजर आए. वहां पर खड़े जालम सिंह उसेंडी ने बताया कि यहीं रमेश का अंतिम संस्कार करने की तैयारी है. खुद को रमेश का रिश्तेदार बताने वाले जालम कहते हैं कि मूर्ति रमेश के पिता मेघनाथ जुर्री की ह., निधन के बाद उनका अंतिम संस्कार भी यहीं किया गया था. आस-पास पसरे सन्नाटे के बीच थोड़ी-थोड़ी देर में घर से रोने की अवाज के अलावा मुर्गे की बांग भी सुनाई दे रही थी.

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अर्जी पर सुनवाई नहीं
घर में पड़े सोफे पर रमेश की मां सत्यावती बेसुध पड़ी हैं. कुछ कहने की कोशिश करती हैं तो मुंह से आवाज नहीं आखों से आंसू निकल पड़ते हैं. उनके आस-पास कुछ महिलाएं और लड़कियां चुप-चाप बैठी एक दूसरे को देख रही हैं. इसी बीच हमारी मुलाकात रमेश की मौसी विद्या उसेंडी से हुई. विद्या ने बताया कि बहू सुनीता (रमेश की पत्नी) ने शनिवार की शाम को फोन किया कि उनका फोन नहीं लग रहा, कुछ पता भी नहीं चल रहा. टीवी पर खबर चल रही है कि मुठभेड़ हुई है और कई लोग मारे गए हैं. तब हमें पता चला कि बेटा अब नहीं रहा.
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रुदन भरी आवाज में विद्या कहती हैं- दीदी (रमेश की मां) अभी कुछ दिन पहले ही उसका ट्रांसफर घर के पास करने के लिए जगदलपुर में पुलिस अधिकारियों को अर्जी दी थी. इसके पहले भी अर्जी दी जा चुकी थी, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. ऐसा कहते ही वो जोर-जोर से रोने लगती हैं.

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अब खेतीबाड़ी ही सहारा
दो भाइयों में रमेश बड़े और संजय जुर्री छोटे हैं. संजय कहते हैं कि पिता की मौत के बाद से ही रमेश ने घर की जिम्मेदारी उठा ली थी. घटना के दो दिन पहले ही रमेश से उनकी फोन पर बातचीत हुई थी. अब टीवी पर समाचार देखकर पता चला कि वह शहीद हो गए हैं. संजय ने बताया कि साल 2015 में रमेश की शादी हुई थी. चार साल की उनकी एक बेटी सेजल है. भाई और भतीजी दोनों भाई के साथ ही बीजापुर में रहती थीं. अभी जगदलपुर में हैं. वहां श्रद्धांजलि कार्यक्रम के बाद ही साथ में आएंगी. उसी वक्‍त एक पुलिस वाले की आवाज आई- 11:55 मिनट पर हेलीकॉप्टर जगदलपुर से कांकेर के लिए निकल गया है. 40 मिनट लगेगा यहां आने में. मैंने घड़ी की ओर देखा तो दोपहर सवा 12 बज रहे थे. हम घर के ही पास उस स्कूल मैदान के लिए निकल गए, जहां प्रशासन ने श्रद्धांजलि सभा रखी थी.

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गांव से पहले भी शहादत
करीब 1900 आबादी वाले पंडरीपानी गांव में रमेश को श्रद्धांजलि देने के लिए सैंकड़ों लोग मौजदू हैं. बड़ी संख्या महिलाओं की है. स्कूल मैदान में कुछ लोग आपस में चर्चा कर रहे थे- इस गांव के लाल ने पहले भी शहादत दी है. दरअसल, वो 9 जुलाई 2007 को सुकमा ज़िले के मरइगुड़ा में नक्सलियों के साथ मुठभेड़ की चर्चा कर रहे थे. इसमें सुरक्षाबलों के 23 जवान मारे गए थे, जिनमें गांव के ज़िला पुलिस बल के सहायक उप निरीक्षक तामेश्वर सिन्हा भी शामिल थे. इनकी आदमकद मूर्ति हमने गांव में प्रवेश के दौरान ही देख ली थी.

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‘बाबू से मिलवा दो’
कुछ देर बाद कुछ गाड़ियों का काफिला कार्यक्रम स्थल पर पहुंचा. काफिले में शामिल एंबुलेंस से पुलिसकर्मियों ने तिरंगे से लिपटी ताबूत निकाली, जिसमें रमेश तिर्की की फोटो चस्पा थी. लाउडस्पीकर में ‘ऐ मेरे वतन के लोगों…’ गाना बज रहा था और लोग ‘रमेश अमर रहे…’ के नारे लगा रहे थे. ताबूत पर एक-एक कर फूल-माला चढ़ाने का सिलसिला चल रहा था. कुछ वर्दीधारी तो कुछ सफेद कपड़ा पहने लोग एक के बाद एक कर श्रद्धांजलि दे रहे थे. कुछ लोग सरकार और व्यवस्था पर सवाल उठा रहे थे तो कुछ नक्सलियों को मुंहतोड़ जवाब देने की बात कहते सुने जा रहे थे. चर्चा सीएम भूपेश बघेल और केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह की भी हो रही थी, जो शहीदों को श्रद्धांजलि देने बस्तर संभाग मुख्यालय जगदलपुर पहुंचे थे.

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सैकड़ों की भीड़ में एक धीमी आवाज गाने और नारों की तेज आवाज को काट कर ध्यान अपनी ओर खींच रही थी. रुदन भरी आवाज में सुनीता बिना रुके ही कह रहीं थीं. मेरा बाबू कहां चला गया, मेरे बाबू से मिलवा दो… लोग उन्‍हें समझाने का प्रयास कर रहे थे. इधर, कभी दादी तो कभी रिश्तेदारों की गोद दर गोद बदल रही सेजल की निगाहें एकटक तिरंगे से लिपटे ताबूत को देख रही थीं.

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