हरि वर्मा
आज रात 12 बजे से संपूर्ण देश में 21 दिनों का संपूर्ण लॉकडाउन होगा। यह जनता कर्फ्यू व कर्फ्यू से भी सख्त होगा। कोरोना यानी को (कोई) रो (रोड पर) ना (ना निकले)। ठीक एक साल पहले 24 मार्च 2020 को
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब राष्ट्र के नाम यह संदेश दिया तो सभी सन्न रह गए। टीवी स्क्रीन, न्यूज रुम से लेकर
दफ्तरों, घर-सोसाइटी और बाजार तक बेचैनी दिखी। अफरातफरी। चारों तरफ भागदौड़। घर से फोन आया।
सोसाइटी के बाजार में लोग थोक में आलू, नमक, दूध उठा रहे हैं। बाजार में किसी ने पांच-पांच पैकेट नमक के
उठा लिए, तो किसी ने दूध। जरूरत की चीजें खरीदने के लिए मारामारी। देर रात तक सोसाइटी में बॉलकनी से
लेकर सर्विस लेन तक लॉकडाउन की ही चर्चा। … तो क्या कल से बाजार नहीं खुलेंगे। दफ्तर बंद रहेंगे।
सार्वजनिक वाहन नहीं चलेंगे। वह भी 21 दिनों तक। अगली सुबह 25 मार्च को कुछ लोग घरों से बाहर लॉकडाउन का तमाशा देखने सड़कों पर निकले। रोक-टोक। पुलिस पिटाई। वाहन वालों से मूवमेंट पास और आवश्यक सेवाओं के सुबूत की मांग व जगह-जगह छानबीन। सख्ती। लॉकडाउन की घोषणा से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने अलग-अलग नेशनल मीडिया ( इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट ) से ऑनलाइन बातचीत में
लॉकडाउन की ओर इशारा करते हुए चिंता जताई- अगले 21 दिन चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं। देखना है कितनी जान बचा पाते हैं।
बहुरूपिया का चकमा
कई चरणों में लॉकडाउन व अनलॉक के एक साल बाद आज हालात फिर उसी ओर इशारा कर रहे हैं। महाराष्ट्र
के दो जिलों बीड और नांदेड में 26 मार्च से 4 अप्रैल 2021 तक फिर से संपूर्ण लॉकडाउन लगाने की नौबत आ गई। महाराष्ट्र और पंजाब में भयावह स्थिति है। 18 राज्यों में नये स्ट्रेन ने पांव पसार दिया है। देश के संक्रमित अव्वल दस जिलों में अकेले महाराष्ट्र के ही नौ जिले हैं। एक कर्नाटक का। 24 मार्च 2021 को फिर 47 हजार से अधिक मामले आ गए। 275 मौत। कुल संक्रमित 1 करोड़,17 लाख, 34 हजार, 058 हैं जबकि 1 करोड़, 12 लाख, 05 हजार 160 स्वस्थ भी हुए। कोरोना बहुरूपिया की तरह रोज रंग बदल रहा है। अब तक
771 बार रंग बदल चुका है। जाहिर है पिछले एक साल की सख्ती का ही नतीजा है कि जितने संक्रमित हुए, उसी अनुपात में स्वस्थ हुए। फिर भी 1 लाख 60 हजार 441 की जान चली गई।बहुरूपिया हमें चकमा दे रहा है। हम सतर्कता के बूते ही बहुरूपिया के बदलते रंग-ढंग को चुनौती दे सकते हैं।
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चक्रवृद्धि ब्याज की तरह संक्रमण
आंकड़ों पर यदि गौर करें तो भारत में जब केरल में पहला मामला मिला था तो 67 दिन में एक लाख लोग संक्रमित हुए। 11 दिन बाद ही यह आंकड़ा 2 लाख पहुंच गया। चार दिन बाद 3 लाख पार। यूं कहें चक्रवृद्धि ब्याज से भी तेजी से संक्रमण फैला। तब दवाई भी नहीं थी। कड़ाई हुई। लक्ष्मण रेखा, मन में खौफ और खुद की एहतियाति सतर्कता की बदौलत महामारी पर नियंत्रण जैसी स्थिति बनती गई। आज दवाई भी है लेकिन कड़ाई नहीं। लापरवाही हद पार करती जा रही है। आलम यह है कि मुंह पर मास्क, सैनिटाइजर, बार-बार हाथ धोने और आपस में सामाजिक दूरी का पालन गंभीरता से नहीं हो रहा है। सार्वजनिक आयोजन से लेकर परिवहन तक गाइडलाइन की अनदेखी हो रही है। जिस तेजी से दूसरी लहर की ओर देश बढ़ रहा है, वैसे में स्वास्थ्य मंत्रालय की चिंता वाजिब है। आंकड़े बताते हैं 16 जनवरी 2021 से योद्धाओं का टीकाकरण शुरू हुआ। फिर दूसरे चरण में
60 पार बुजुर्गों का और 45 पार बीमारों का। इसके बाद भी 24 मार्च को सुबह 10 बजे तक महज 5 करोड़,08 लाख, 41 हजार 286 को ही वैक्सीन लग पाई।
दो डोज की कीमत जानो बाबूजी
1 अप्रैल 2021 से सरकार 45 साल की उम्र पार वालों को टीकाकरण के दायरे में लाने जा रही है। स्वास्थ्य
मंत्रालय का यह भी दावा है कि वैक्सीन की कोई कमी नहीं है। यहां यह बता दें कि अब तक जो 1 लाख 60
हजार से अधिक मौतें हुई हैं, उनमें 88 फीसदी 45 या उससे अधिक उम्र वाले शामिल हैं। जाहिर है टीका बनने के बाद महज 16 जनवरी से 1 अप्रैल के बीच ही इस सबसे खतरनाक उम्र सीमा वाले को टीका के दायरे में लाना सरकार की एक उपलब्धि है लेकिन इस उपलब्धि के सामने बड़ी चिंता और चुनौती भी है। इस चिंता और चुनौती के बीच टीका को लेकर सियासत और शंका कहीं न कहीं स्वस्थ भारत मुहिम को झटका लगा रहा है।
उससे भी ज्यादा चिंताजनक तो इस बेशकीमती वैक्सीन का यूं ही बर्बाद होना है। आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब में वैक्सीन की बर्बादी ज्यादा हुई है। राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बैठक में प्रधानमत्री भी वैक्सीन की इस बर्बादी पर चिंता जता चुके हैं। हमें दो बूंद जिंदगी की तरह दो डोज की कीमत पहचाननी होगी। सरकार ने भले जरूरतमंदों के लिए सरकारी केंद्रों पर मुफ्त और निजी केंद्रों पर सेवा शुल्क समेत महज ढाई सौ रूपये में वैक्सीन उपलब्ध करा दी है, लेकिन जब तक वैक्सीन नहीं बनी थी तो कीमत को लेकर अटकलें लगती रहीं। यह सही है कि ढाई सौ रूपये में तो सर्दी-जुकाम का भी इलाज नहीं हो पाता। ऐसे में वैक्सीन की कीमत से ज्यादा महत्व इसकी जीवनरक्षा को लेकर है, वह भी उस महामारी से जिससे पूरी दुनिया लड़ रही है। इसलिए यह बेशकीमती है। सो,वैक्सीन की बर्बादी रोककर इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना होगा।
जान और जहान दोनों जरूरी
लेकिन याद कीजिए तब। कोई फोन पर बात करते हुए खांस भी देता था तो उधर से पहला सवाल यही होता-
क्या तबीयत तो ठीक है न। यदि परिवार में कोई संक्रमित हो गया तो पूरा परिवार न केवल उस समय की
गाइडलाइन के हिसाब से उससे दूरी बना लेता बल्कि परिवार का हर सदस्य दहशत के साये में सांसें लेता।
कोरोना वाले कॉलर ट्यून भी बदलते रहें। हमें बीमारी से लड़ना है, बीमार से नहीं। हजारों लोगों ने लॉकडाउन का दंश झेला। कामकाज से घर लौटने की पीड़ा झेली। मीलों पैदल चले। पांव में छाले पड़ गए। जैसे-तैसे जब लोगों की जान बची तो जहान (अर्थव्यवस्था) की चिंता सामने दिखी। आर्थिक मोर्चे पर अरसे दर्द झेला।

दवाई के साथ ढिढ़ाई नहीं, कड़ाई जरूरी
आज दवाई आने के बाद ढिढ़ाई बढ़ती ही जा रही है। जो संक्रमित हुए, उनमें से ज्यादातर ने पहले डर से
वैक्सीन नहीं लगवाई। मोदी के टीका लगाने के बाद जब भरोसा बढ़ा तो टीकाकरण मुहिम में तेजी आई लेकिन
दवाई के साथ कड़ाई के मोर्चे पर लोग सुस्त पड़ते चले गए। अभी भी कई ऐसे संक्रमित हैं जिन्होंने टीका नहीं लगवाया, जबकि योद्धाओं, बुजुर्गों और 45 पार बीमारों के लिए टीकाकरण जारी है। अब तो 45 पार वालों की बारी आनेवाली है। ऐसे में दो डोज जिंदगी जरूरी है तो साथ-साथ दो गज की दूरी, मास्क और बार-बार हाथ धोने वाली कड़ाई भी। कोरोना संक्रमण के फिर पुराने ढर्रे की ओर जाना खतरे से खाली नहीं है। कई राज्यों में नाइट कर्फ्यू, शिक्षण संस्थान, सार्वजनिक आयोजनों पर रोक लगाने की नौबत आ गई है। महाराष्ट्र के दो जिलों में संपूर्ण लॉकडाउन की ओर कदम बढ़ गया है। ऐसे में दवाई भी, कड़ाई का मंत्र ही जान और जहान दोनों के बचाव के लिए जरूरी है। हमें एकजुट होकर अफवाहों, सियासत, धर्म और भ्रम की बेड़ियों को तोड़ना ही होगा। अब दवाई भी, कड़ाई भी। ढिढ़ाई बिल्कुल नहीं।








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