आगामी 1 अप्रैल को बिहार में शरा’बबंदी कानून के लागू हुए पांच साल का वक्त हो जायेगा. भले ही सूबे में इस कानून के लागू हुए इतना लम्बा वक्त गुजर गया हो लेकिन इसको लेकर वाद-विवा’द का सिलसिला अभी तक थमा नहीं है. बीतें पांच सालों में यह मुद्दा बराबर ही अखबारों के सुर्खियों में बना रहा और विगत विधानसभा चुनाव में इसकी शोर भी सुनाई दी. लेकिन इस सब के बीच सबसे अहम सवाल यह है कि जिस मकसद के साथ नीतीश कुमार की अगुवाई वाली सरकार ने इस कानून को लागू किंया, क्या वो कारगर रहा. इस सवाल का जवाब जानने के क्रम में सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि इस कानून को लागू करते वक्त सरकार ने किन बातों को ध्यान में रखा था.
नवम्बर 2015 का तो समय था. जब लोकसभा चुनाव में बीजेपी को सिर माथे बिठाने वाली बिहार की जनता ने पटखनी देते हुए नीतीश कुमार की अगुआई वाली महागठबंधन को प्रचंड जनादेश से नवाजा था तब विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश कुमार ने साफ़ इशारा कर दिया था कि सूबे में पूर्ण शरा’बबंदी किये बिना महिला सशक्तीकरण के दिशा में राज्य आगे नहीं बढ़ पायेगा. महिलाओं की आबादी का झुकाव नीतीश कुमार की तरफ देखने को मिला. कई क्षेत्रों में 70 फीसदी से अधिक महिलाए वोट करने आगें आई और राज्य में महिलाओं का मतदान प्रतिशत 59.92 से ज्यादा हो गया. परिणाम स्वरूप नीतीश कुमार जब इस दफा सत्ता में वापस लौटें तो उन्होंने राजस्व की चिंता किये बगैर साहसिक कदम उठाते हुए प्रदेश में पूर्ण श’राबबंदी कानून को लागू कर दिया.
घरेलू हिं’सा के मामलों में भारी गि’रावट
बिहार में श’राबबंदी का अगर सबसे बड़ा फायदा किसी मोर्चे पर हुआ तो तो महिला सशक्तीकरण ही था. जिस राज्य के अखबारों में शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो जब पारिवारिक कलह और महिलाओँ के प्रति घरेलू हिं’सा की खबरें न प्रकाशित होती हों. यहीं इस कानून के लागू होने के बाद क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिला. मोटे तौर पर देखें तो राज्य के हैप्पीनेस इंडेक्स में भी इस कानून की वजह से उछाल देखने को मिला. कानून के प्रभावी होने के बाद खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में रहनेवाली महिलाए अलग-अलग रिपोर्टूस के हवाले से ये कहते सुनीं गई कि सरकार के इस फैसले से उनके घर में एक भ’य मुक्त और खुशहाल वातावरण व्याप्त हुआ है. मसलन वो लोग जो श’राब पिने के आदि थे, उनके व्यावहार में “अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिला है
श’राब का सिंडीकेट ध्व’स्त
शरा’बबंदी काकूश्चा के राज्य में प्रभावी होने के बाद प्रशासन के सरदृती भी रूख से इसकी त’स्करी करने वाले वर्गों में भी जब’रदस्त हलचल देखने को मिला. बड़ी तादाद में कानून का पालन न करने वाले लोगो पर मु’कदमा और क’रवाई हुईं. नतीजतन प्रदेश में शराब का सिंडीकेट भी मोटे तौर पर ध्व’स्त हो गया. चूंकि पूर्णत: इस पर पा’बंदी लगाना आसन नहीं है, लेकिन हर समय चौवकने प्रशासन ने बेहतर पुलिसिंग का नमूना पेश करते हुए काफी हद तक इस पर काबू पा लिया.
राजस्व को नु’कसान नहीं
शरा’बबंदी लापूहोने के बाद जो सबसे बंडा सवाल उठ रहा था तो यही था कि आखिर शाब से आने बाले राजस्व का
जो नुक’सान होगा, उसकी भ’रपाई सरकार कहीं से क्रोगी. यह सवाल लाजमी भी है. सर्वविदित है कि राजस्व के सबसे बड़े स्रोतों में एक शराब का व्यवसाय भी है. लेकिन शराबबंदी के बाद भी सूबे को राजस्व का भारी नुकसान नहीं हुआ. इसका सबसे बडा बजह ये रहा कि राज्य के वे लोग जो पाले श’राब पर रुपये खर्च करते थे, उन्हें बचाने लगे और उनका इस्तेमाल अपनी दूसरी जरूरतों को पूरा करने के लिए किया.
अगर हम राजस्व के आंकडे को देखे तो राज्य को श’राब पर वैट (बैल्यूऐडेड टैक्स) और एक्साइज डूयड्डी से तकरीबन पांच हजार करोड़ रुपये की कमाई होती थी. बित्त वर्ष 20 15-01 6 में सरकार को जितना राजस्व प्राप्त हुआ था. श’राबबंदी के प्रभावी होने के बाद वित्त वर्ष 2016…2017 में मामूली नु’कसान के साध मोटे तीर पर राजस्व के रूप में इतनी ही राशी प्राप्त हुईं. जो इस बात की तसदीक करता है कि राज्य में श’राबबंदी से किसी भी मोर्चे पर नुक’सान नहीं हुब है. हालाँकि इस कानून को मज़बूत करने के लिए और संभावनाएं जरूर है. लेकिन कुल मिलाकर देखे तो सरकार काफी हद तक लोकहित में लिए इस फैसले को सफल बनाने में कामयाब हुई है.








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