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उज्जैन से 170 किमी दूर भी है चिंतामण गणेश, सम्राट विक्रमादित्य के हाथ से पुष्प गि’रने पर हुए थे प्रकट ‘ॐ गणेशाय नमः’

उज्जैन में स्थित चिंतामण गणेश मंदिर और यहां की महिमा से तो आप सभी भलीभांति परिचित हैं ही। यहां दर्शन करने से सारी चिंताओं से मुक्ति मिलती है। बप्पा का नाम ही चिंतामण है। इसका मतलब होता है चिंता को हरने वाला। यहां भगवान गणेश चिंतामण, इच्छामन और सिद्धिविनायक स्वरूप में विराजित हैं। हर बुधवार को यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। अब बात करते हैं सीहोर शहर की। उज्जैन से 170 किमी दूर इस शहर में भी चिंतामण गणेश मंदिर है। यहां भगवान गणेश रिद्धि सिद्ध्रि माता के साथ विराजित हैं। यहां भगवान गणेश की मूर्ति आधी जमीन में धंसी हुई है। भक्तों को साक्षात रूप में बप्पा के दर्शन होते हैं। मान्यता है कि यहां उल्टा स्वास्तिक बनाने से मनोकामनाएं पूर्ण होती है। यहां भगवान गणेश के विराजने और मंदिर बनने की कथा भी रोचक है।

उज्जैन के महाराजा विक्रमादित्य ने बनवाया है मंदिरकहा जाता है कि वर्षों पूर्व उज्जैन के न्यायप्रिय सम्राट विक्रमादित्य ने इस मंदिर का निर्माण विक्रम संवत् 155 में श्रीयंत्र के अनुरूप करवाया गया था। यहां विराजित गणेशजी की प्रतिमा खड़े स्वरूप में है। आधी मूर्ति जमीन के अंदर धंसी हुई है। कहा जाता है कि चिंतामण गणेश की यह मूर्ति स्वयंभू है। इस मंदिर को लेकर एक कथा उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि विक्रमादित्य की भक्ति और पूजन से प्रसन्न होकर भगवान गणपति ने उन्हें दर्शन दिए और मूर्ति रूप में स्वयं ही यहां स्थापित हो गए। कथा के अनुसार एक बार सम्राट विक्रम के सपने में भगवान गणपति आए और उन्होंने पार्वती नदी के तट पर पुष्प रूप में अपनी मूर्ति होने की बात बताकर उसे स्थापित करने का आदेश दिया। सम्राट विक्रम ने वैसा ही किया। पार्वती नदी के तट पर उन्हें वह पुष्प भी मिल गया और उसे रथ पर अपने साथ लेकर वह उज्जैन की ओर लौटने लगे। रास्ते में रात हो गई और अचानक वह पुष्प गिर पड़ा और गणपति की मूर्ति में परिवर्तित होकर वहीं जमीन में धंस गया। राजा के साथ आए अंगरक्षकों ने जंजीर से रथ को बांधकर मूर्ति को जमीन से निकालने की बहुत कोशिश की पर मूर्ति निकली नहीं। तब सम्राट विक्रम ने गणपति की मूर्ति वहीं स्थापित कर इस मंदिर का निर्माण कराया। वहीं इतिहासकारों के मुताबिक सीहोर में चिंतामण गणेश का मंदिर का जीर्णोद्धार बाजीराव पेशवा प्रथम ने करवाया था। गौंड राजा नवल शाह, शालीवाहन शक, राजा भोज और कृष्ण राव ने मंदिर की व्यवस्था में सहयोग दिया। नानाजी पेशवा के समय इस मंदिर की ख्याति फैली।


चिंता से मिलती है मुक्ति कथाओं के अनुसार सम्राट विक्रम परेशानी और चिंता से मुक्ति के लिए यहां आते थे। इसके चलते भी लोग यहां आते हैं और चिंता दूर करने की मन्नत मांगते हैं। लोगों के अनुसार यहां समस्या का समाधान अवश्य ही होता है। भक्त मंदिर के पिछले हिस्से में उल्टा स्वास्तिक बनाकर मन्नत मांगते हैं। मन्नत पूरी हो जाने पर श्रद्धालु दोबारा यहां आते हैं स्वास्तिक हो सीधा बनाते हैं। यहां गणेश चतुर्थी पर भंडारा भी होता है। कहा जाता है कि वर्षों पहले यहां कोई बीमारी फैली थी। लोगों ने भगवान से मन्नत मांगी कि बीमारी ठीक हो गई तो यहां हर माह गणेश चतुर्थी मनाएंगे। इसके बाद बीमारी ठीक हो गई और यहां चतुर्थी को भंडारे का आयोजन होने लगा।

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