अक्सर हम परिवेश में देखते हैं कि जो सत्-पथ पर चलते हैं, धर्म के पथ पर चलते हैं, भगवान को लेकर चलना चाहते हैं उनको अपने परिवार-परिवेश से अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है । इस प्रसंग में युगपुरुषोत्तम श्रीश्रीठाकुर कहते हैं-”प्रवृत्ति के उपासक हैं जो, वे तो भगवदुपासना के पथ पर बाधा सृष्ट करेंगे ही, इसमें विचित्र क्या है? यह बाधा ही भक्त के आग्रह को और भी ज्वलन्त कर देता है। इसलिए प्रकारान्तर यह बाधा भक्ति का परिपोषक बन जाती है । परमपिता की दया की धारा विचित्र है । हमलोगों की प्रवृत्ति-चाह अनेक समय frustrated (व्यर्थ) होती है, यह भी परमपिता की दया है। जो इष्ट को चाहता है वह प्रीतिकर, अप्रीतिकर, सुविधाजनक, असुविधाजनक सारे उपादान को ही इष्टस्वार्थप्रतिष्ठा के अनुकूल बना देता है । इससे ही होता है शक्ति व भक्ति का समन्वय । जो भक्ति बाधा को जय करना नहीं जानती, वह भक्ति शक्तिहीन है । और, वह भक्ति के नाम के योग्य है कि नहीं कहा नहीं जा सकता । भक्त के राजा हैं हनुमान । पग-पग में उनको बाधा मिली है, और पराक्रम के संग उसमें वे उत्तीर्ण हुए हैं । और साथ ही साथ श्रीरामचन्द्र के मुख पर हंसी खिली है एवं परिवेश के लिए भी अच्छा हुआ है। सिर्फ एकांत में निर्झंझट मन के सुख में जपतप करने के माध्यम से भक्ति सिद्ध नहीं होती है । जैसा कि इसकी जरूरत है उसी प्रकार इष्ट के लिए responsibility (दायित्व) लेकर कठोर श्रम से उसे successful execute (सफलतापूर्वक निष्पादन) करने की भी जरूरत है। इष्ट के लिए सर खपाना पड़ता है, पसीना निकालना पड़ता है, स्वयं को अक्षत रखकर अग्नि के समुद्र में कूदना पड़ता है । उनकी इच्छा को पूरण करने के क्रम में कितने प्रकार की परिस्थिति व मनुष्य के सम्मुखीन होना पड़ता है, स्वयं उद्देश्य में अटूट रहकर सबकुछ manage व manipulate (परिचालना व नियंत्रण) कर सभी के कल्याण को अवधारित करते हुए पारस्परिक प्रीतिसंगति को सलील कर सीढ़ी-दर-सीढ़ी अग्रसर होना पड़ता है । इसके द्वारा ही self-confidence, personality, experience, wisdom (आत्मविश्वास, व्यक्तित्व, अभिज्ञता, प्रज्ञा) विकसित होते हैं । भक्त भगवान के हाथों उनकी मांगलिक शक्ति के एक शक्तिमान हथियारस्वरूप बन जाता है । एक भक्त जहाँ रहता है उसके आसपास सभी तरह से उन्नत हो जाता है। इस योग्यता के अभ्युदय के विषय में आराम-विराम की अपेक्षा बाधा-विघ्न व झंझावात ही अधिक फलप्रसू होता है । पर विश्वप्रकृति दृश्य अदृश्य विभिन्नतरह से उसे शक्ति, साहस व सहयोग प्रदान करती है । सत्-शक्ति के अन्तिम जय की अनिवार्यता के संबंध में वह किसी भी अवस्था में ही विश्वास नहीं खोता है। इसलिए घनघोर अंधकार के बीच भी वह आशा का आलोक आविष्कार कर लेता है । और, इसलिए ही उसे अतन्द्रभाव से मंगल-अभियान में चलन्त रखता है ।”
यदि वृक्ष में आम है और पास में पत्थर हो, वह चाहे जितना भी बड़ा या शक्तिशाली क्यों न हो, आम गिरेगा नहीं । मगर वही पत्थर जब किसी ऐसे हाथ में पड़ जाये जिसका निशाना ठीक हो तो आम का टूटना तय है-हालाँकि आम पत्थर ही गिराता है, पर हाथ की सहायता से । उसी प्रकार हममें जितनी भी शक्ति क्यों न रहे यदि हम ऐसे किसी हाथ में अपने को नहीं सौंपते हैं तो आम टूटेगा नहीं । वह पत्थर हम हैं, आम है वह इष्टप्रतिष्ठा का फल और वह हाथ है हमारे आचार्यदेव परमपूज्यपाद श्रीश्रीदादा । आज न जाने कितने हम जैसे छोटे-मोटे कंकर से भी वे इष्टप्रतिष्ठा के फल तुड़वा रहें हैं उसका ठिकाना नहीं । क्यों न हम अपनी निष्ठा को संपूर्ण रूप से उनको सौंप कर दीक्षा के संकल्प-आज से इष्टस्वार्थ व इष्टप्रतिष्ठा करना ही हमारे जीवन का यज्ञ हो–को सचमुच में वास्तवायित करें । इष्टपथ पर चलने का दिशा-निर्देश युगपुरुषोत्तम परमदयाल श्रीश्रीठाकुर की इस वाणी में है- पुरुषोत्तम-रागदीप्त मूर्त्त इष्ट में निष्ठा रखो, पुरुषोत्तम के मूर्त्त प्रतीक इष्ट को तुम सदा ही जानो ।




Leave a Reply