विश्वकर्मा पूजा (Viswakarma Puja) हर वर्ष बंगाली माह भाद्र के आखिरी दिन यानी भाद्र संक्रांति को मनाई जाती है. इसे कन्या संक्रांति (Kanya Sankranti) भी कहा जाता है. इस वर्ष विश्वकर्मा पूजा 16 सितंबर (बुधवार) यानी आज मनायी जा रही है. आज के दिन विधिपूर्वक भगवान विश्वकर्मा (Lord Viswakarma) की पूजा करने से रोजगार और बिजनेस (Business) में तरक्की मिलती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का शिल्पी कहा जाता है. वह निर्माण एवं सृजन के देवता हैं. वह संसार के पहले इंजीनियर और वास्तुकार भी कहे जाते हैं.
कौन हैं भगवान विश्वकर्मा
वास्तुदेव तथा माता अंगिरसी की संतान भगवान विश्वकर्मा हैं. वह शिल्पकारों और रचनाकारों के ईष्ट देव हैं. कहते हैं कि उन्होंने सृष्टि की रचना में ब्रह्मा जी की मदद की थी और पूरे संसार का मानचित्र बनाया था. भगवान विश्वकर्मा ने स्वर्ग लोक, श्रीकृष्ण की नगरी द्वारिका, सोने की लंका, पुरी मंदिर के लिए भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों, इंद्र के अस्त्र वज्र का निर्माण किया था. ऋगवेद में उनके महत्व का पूर्ण वर्णन मिलता है.

विश्वकर्मा पूजा का मुहूर्त
16 सितंबर को सुबह 06 बजकर 53 मिनट पर कन्या संक्रांति का क्षण है. इस समय पर सूर्य देव कन्या राशि में प्रवेश करेंगे. कन्या संक्रांति के साथ ही विश्वकर्मा पूजा का मुहूर्त है. पूजा के समय राहुकाल का ध्यान रखना होता है. विश्वकर्मा पूजा के दिन राहुकाल दोपहर 12 बजकर 21 मिनट से दोपहर 01 बजकर 53 मिनट तक है. इस समय काल में पूजा न करें.
विश्वकर्मा पूजा के दिन का पंचांग
दिन: बुधवार, आश्विन मास, कृष्ण पक्ष, चतुर्दशी तिथि
दिशाशूल: उत्तर
विशेष: सूर्य की कन्या संक्रांति
भद्रा: सुबह 09:33 बजे तक
विक्रम संवत 2077 शके 1942 दक्षिणायन, उत्तरगोल, शरद ऋतु शुद्ध आश्विन मास कृष्णपक्ष की चतुर्दशी 19 घंटे 57 मिनट तक, तत्पश्चात् अमावस्या मघा नक्षत्र 12 घंटे 21 मिनट तक, तत्पश्चात् पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र सिद्धि योग 07 घंटे 41 मिनट तक, तत्पश्चात् साध्य योग सिंह में चंद्रमा.
विश्वकर्मा पूजा का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संसार में जो भी निर्माण या सृजन कार्य होता है, उसके मूल में भगवान विश्वकर्मा विद्यमान होते हैं. उनकी आराधना से कार्य बिना विघ्न पूरे हो जाते हैं. बिगड़े काम भी बनते हैं




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