तबरेज की तत्परता ने बचायी एईएस से बच्चे की जान
- 30 मिनट के अंदर पहुंचाया अस्पताल
- 3 दिन में बच्चे को मिल गयी अस्पताल से छुट्टी
मोतिहारी। 11 जून
जेई और एईएस को लेकर प्रखंड स्तर पर एक अस्पताल प्रबंधन कमीटी बना हुआ है। इस कमिटी में केयर बीएम, एमओआइसी, जीविका बीपीएम, हेल्थ बीएचएम, बीडीओ या उनके द्वारा नामित व्यक्ति होते हैं। इस कमिटी की बैठक प्रत्येक दिन शाम को चार बजे होती है। सीएम और आशा के कामों का पर्यवेक्षण करते हैं। पहले से ही दलित और महादलित के लोगों का डेटा तैयार है। उन लोगों के बीच में जाकर आशा और सीएम जीविका जाकर पिछले वर्ष के एईएस बच्चों का मॉनिटरिंग करते हैं तथा दलित तथा महादलित लोगों में जागरुकता फैलाते हैं। जिस बच्चे में लक्षण मिलता है उसको अस्पताल पहुंचाने का काम करते हैं। महादलित टोलों में दूरभाष नंबर 06252-242418, 06252296406 पर तुरंत ही सेवा मिलती है।

- यह बातें जीविका मोतिहारी के तुरकौलिया ब्लॉक के मास्टर रिसोर्स पर्सन तबरेज आलम कह रहे थे। उनकी तत्परता से एक बच्चे की जान बचायी जा सकी। तबरेज कहते हैं कि मैं और मेरी टीम के कुछ सदस्य एक गांव से कुछ कार्यक्रम कर अपने घर को लौट रहे थे। घर आते-आते रात को 8 बज चुके थे। जब वह अपने मुहल्ले में आए तो देखा कि वहां काफी भीड़ जमी है, पास जाकर देखा तो रियाज का बेटा चमकी के लक्षण के साथ बेसुध पड़ा है। उसे देखते ही कुछ दिन पहले पंपलेट की वह बात उन्हें याद आ गयी। जिसमें चमकी के लक्षण के बारे में लिखा था। रियाज का बेटा भी ठीक वैसे ही लक्षण समेटे था दांते एक दूसरे के उपर चढ़ी हुई। रात का समय भी। जरा भी देर न करते हुए उसने केयर के बीएम रजनीश को फोन मिलाया। उनसे लक्षण पूछने के बाद वह कंफर्म हो गया कि बच्चे को चमकी ही है। किसी और डॉक्टर के पास न ले जाते हुए मैंने कहा कि सदर अस्पताल में इसका सफल इलाज है, बशर्ते कि सही समय ले जाया जाए। फौरन ही हमने एक ऑटो को किराए पर लिया और सदर अस्पताल में चले गये। यह सारा कार्यक्रम 30 मिनट के अंदर का ही था। वहां उसका तुरंत ही ग्लूकोज के स्तर 3 दिनों तक उस बच्चे का इलाज चला और उसे फौरन ही अस्पताल से छुट्टी दे दी गयी। तबरेज फिर कहते हैं कि यह सारा श्रेय तत्परता को जाता है।

- चमकी बुखार में शुरुआती 45 मिनट बहुत महत्व रखता है। अगर कोई बच्चा इस समय के भीतर अस्पताल पहुंच जाता है तो उसकी जान निश्चित तौर पर बच जाती है। मैं अपने जागरुकता की बातों में इस बात पर काफी जोर देता हूं। तत्परता के मायनों को समझाता हूं। लोगों को समझाता हूं कि बच्चों को खाली पेट न सोनें दें। दिन में दो बार नहलाएं। खाने में कुछ मीठा जरुर दें। अभी भी उस बच्चे समेत अपने क्षे़त्र के उन बच्चों पर भी नजर रखता हूं जो ईलाज कराकर लौट चुके है। उस दिन के वाक्ये के बाद मेरा ध्येय और कर्तव्य दोनों ही एईएस के प्रति बढ़ गया है।



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