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“जय हिंद” शहीद होने से पहले मां से कहा- मैं पंछी बन आऊंगा वापस, कर्नल आशुतोष के लिए जुनून थी वर्दी…

वो अक्सर घर को सम्भालती, संवारती रहती है

मेरी मां मेरे घर आने की राह निहारती रहती है

लौट कर आऊंगा मैं भी पंछी की तरह मैं भी एक दिन

वो बस इसी उम्मीद में दिन गुजारती रहती है

उससे मिले हुए हो गया पूरा एक साल लेकिन

उसकी बातों में मेरे सरहद पर होने का गुरूर दिखता है।’

नई दिल्ली, जेएनएन। यह सिर्फ एक कविता नहीं है। सरहद पर तैनात एक भारतीय योद्धा की मां के मन में करवटें लेतीं भावनाएं हैं। मां की इन्हीं भावनाओं को उसके बेटे ने शब्द देकर मां को समर्पित किया और शहीद हो गया। जम्मू-कश्मीर के हंदवाड़ा में रविवार को शहीद हुए कर्नल आशुतोष शर्मा की लिखी ये चंद पंक्तियां दर्शाती हैं कि मातृभूमि के प्रति अपना कर्तव्य निर्वाह करते हुए भी वह अपनी जन्म देने वाली मां को कभी विस्मृत नहीं कर पाते थे। शहीद कर्नल आशुतोष शर्मा की पत्नी पल्लवी ने मीडिया को बताया कि इसी 28 अप्रैल को उन्होंने मां के लिए यह कविता लिखी थी।

सबके चहेते थे कर्नल शर्मा

कर्नल शर्मा साथी अधिकारियों और जवानों में खूब लोकप्रिय थे। उनके कनिष्ठ अधिकारी और अधीनस्थ जवानों के अनुसार वह अनुशासनप्रिय और विनोदशील थे। वह अक्सर जवानों के साथ बातचीत में उनकी गतिविधियों का जायजा लेते हुए उन्हें अपने तरीके से हंसाते थे। लेकिन जंग के मैदान में वह उतने ही शातिर और खतरनाक हो जाते थे और देश के दुश्मनों की गर्दन मरोड़ने में एक सेकंड की भी देर नहीं करते थे।
वर्दी उन्होंने चुनी थी, शहादत पर आंसू के लिए जगह नहीं

शहीद कर्नल आशुतोष शर्मा की पार्थिव देह सोमवार को जयपुर लाई जाएगी और यहीं सैनिक सम्‍मान के साथ उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया जाएगा। मूल रूप ये उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के रहने वाले आशुतोष शर्मा की मां, बड़े भाई पीयूष शर्मा, पत्नी पल्लवी शर्मा और 12 साल की बेटी तमन्ना जयपुर में ही रहते हैं। हंदवाडा के एनकाउंटर में आशुतोष शर्मा के शहीद होने की खबर रविवार सुबह उनके परिवार को मिली। खबर सुनने के बाद परिवार को एकाएक धक्का तो लगा लेकिन परिवार को शहादत पर गर्व है।

सेना की वर्दी उनके लिए जुनून थी

पत्नी पल्लवी शर्मा का कहना है कि सेना की वर्दी उनके लिए जुनून थी और उन्होंने जो किया है, वह उनका निर्णय था। ऐसे में हमें कोई हक नहीं बनता कि हम उनके सर्वोच्च बलिदान पर आंसू बहाएं। हमें उनकी शहादत पर गर्व है। उन्होंने बताया कि एक मई को आखिरी बार उनसे बात इुई थी। उस दिन उनकी रेजिमेंट का स्थापना दिवस था। दोपहर में लंच के समय बात हुई। इसके बाद शाम पांच बजे उनका मैसेज था कि वे बाहर हैं।

21आरआर के नाम से कांपते हैं आतंकी

सेना की 21 आरआर बटालियन जिसके लगभग सभी अधिकारी और जवान सेना की गार्ड्स ब्रिगेड से आते हैं, के नाम से सिर्फ कश्मीर में ही नहीं गुलाम कश्मीर बैठे आ’तंकी सरगना भी कांपते हैं। यह वह बटालियन है, जिसने बीते दो दशक में 300 से अधिक आ’तंकियों को मा’र गिराया है। इसीलिए इन्हें ट्रिपल सेंचुरियन कहा जाता है। कर्नल आशुतोष शर्मा इसके दूसरे कमांडिंग ऑफिसर (सीओ) हैं जो आ’तंकी हम’ले में शहीद हुए हैं।

21 आरआर ने 20 साल बाद खोया कर्नल

कश्मीर में आतंकरोधी अभियानों का नेतृत्व कर रही 21 राष्ट्रीय राइफल ने 20 साल बाद कर्नल रैंक का अधिकारी खोया है। इससे पहले 21 अगस्त 2000 को सेना की 21 राष्ट्रीय राइफल के तत्कालीन सीओ कर्नल राजेंद्र चौहान व ब्रिगेडियर बीएस शेरगिल जाचलदारा गांव में आइईडी धमाके में शहीद हो गए थे। इसके करीब 20 साल बाद कर्नल आशुतोष शर्मा रविवार सुबह शहीद हुए।

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