मजदूर दिवस पर विशेष
वो तो चमकीले मकानों की खबर रखते हैं मेरे घर आते नहीं मेरे जख्मों को सीने वाले ……
देवेन्द्र प्रसाद सिंह
मंजर भोपाली का एक शेर है-हम हैं बर्बाद तो उफ़ भी नहीं करता कोई ,
साड़ी दुनिया ही तमाशाई नजर आती है….
वो तो चमकीले मकानों की खबर रखते हैं
मेरे घर आते नहीं मेरे जख्मों को सीने वाले ….
हम बात मजदूर दिवस पर मजदूरों की करने आये हैं । आपको मजदूर शायद सिर्फ चौक -चौराहों पर नजर आएं , गली-कूचों में नजर आएं या फिर इस लौकडॉन में बड़े शहरों के अंधेरों में खोएं नजर आएं। लेकिन मैं जब सडकों पर चलता हूँ तो कोलतार में सनी गिट्टी से भी उनके पसीने की खुशबू आती है। जब ईंटों वाली सड़कें नजर आती हैं या पेवर्स ब्लॉक करीने से बिछे दिखते हैं तो वे बेसाख्ता नज़रों के सामने कौंध जाते हैं । जब ईंट की क्रोनोलॉजी कोई बताता है तो खेतों की केवाल मिट्टी काटते और चिमनी के पास ईंटों को पाथते पसीने से तरबतर मजदूर नजर आते हैं। मैं जब बड़े लोगों के लॉन के फूलों में खिलखिलाता हुआ गुलाब देखता हूँ तो उसमें भी मजदूरों के रक्त की आभा नजर आती है।बड़ी-छोटी कंपनियों की चिमनियों से निकलता धुआं और बढता मार्केट कैप देखता हूँ तो इनके मूल में भी मजदूरों के पसीने को ही पाता हूँ।

अर्थात हर खूबसूरत और चमचमाती वस्तुओं के मूल में इन मजदूरों के ही खून-पसीने की खुशबू महसूस होती है लेकिन जब कामयाबी का इतिहास लिखा जाता है तो इनके मालिकों और मैनेजरों के ही नाम उत्कीर्ण किये जाते हैं ।मज़दूर तो बस बुनियाद की ईंट बनकर मिटटी से ढंका रह जाता है।
आपको मालूम है ताजमहल किसने बनवाया ? सामान्य से लेकर विशेष और अतिविशेष लोगों का एक ही जवाब मिलेगा -शाहजहां ने। क्यों? तो अपनी बेगम मुमताज महल की याद में। कोई नहीं बताता कि यह फारस, तुर्की और भारत के २० हजार सुदक्ष मजदूरों के २२ वर्षों के अथक परिश्रम से नमूदार हो पाया है।और वे मजदूर कहीं कोई दूसरा ताजमहल न बना दें , इसलिए उनके अंगूठे कटवा लिए गए। (ऐसी जनश्रुति है)। हालांकि मुझे नहीं लगता कि ऐसी जनश्रुति होगी भी क्योंकि इन मजदूरों के समर्थन में मशहूर शायर जनाब मंजर भोपाली लिखते हैं-
बनाइये न किसी के लिए भी ताजमहल
हुनर दिखाया तो दस्त-ए-हुनर भी जायेगा….
हालाँकि सृजन करने वाले हाथ कभी विद्रोह नहीं करते।अगर करते तो ये दुनिया इतनी खूबसूरत नजर नहीं आती।लेकिन इस दुनिया को खूबसूरत बनाने और संवारने वालों के साथ न अतीत ने न्याय किया है और न वर्तमान कर रहा है। आज के दौर में मजदूरों कि जहालत किसी से छिपी नहीं है। वर्तमान दुर्दशा के दौर को ही ले लीजिये । लॉकडाउन की वजह से भारत के मजदूर देश-विदेश में फंसे थे। हमारी सरकार बाहर से तो लोगों को ले आई क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर फजीहत का डर था। लेकिन देश के विभिन्न राज्यों में लाखों में फंसे हैं। सिर्फ झारखण्ड के सवा ९ लाख मजदूर बाहर में फंसे हैं। कहीं बड़े पूलों के नीचे बियावान में जमीन पर गमछा बिछाए पड़े हैं तो कहीं नालियां बनाने वाले पाइप में घुसकर सो रहे हैं। लौटने कि बेचैनी में कहीं लाठियां खा रहे हैं तो कहीं जेल भेजे जा रहे हैं। बड़े बाप के बेटों को लाने के लिए कोटा तक कारें जा रही हैं मगर इन बेचारों की सुध कोई नहीं ले रहा । अपनी राज्य सरकार भी नहीं। इन्हें पैदल भी वापस आने नहीं दिया जा रहा। दो दिन पहले विशाखापत्तनम से १५ मजदूर साइकिल से जमशेदपुर तक चले आए। उन्हें मुजफ्फरपुर जाना था लेकिन प्रशासन ने उन्हें नहीं जाने दिया। उलटे उन्हें १४ दिनों के लिए क्वारंटीन में डाल दिया। ये पैदल भी अपने बाल-बच्चों तक नहीं जा सकते। दिल्ली से पैदल यूपी सीमा से होते बिहार सीमा तक पहुँच गए। जब गोपालगंज में घुसने वाले थे तो उनके वोटों से चुने मुख्यमंत्री ने कहा-किसी भी सूरत में उन्हें घुसने नहीं देंगे। हो सकता है कि कोरोना वायरस संक्रमण बढ़ने के भय से नहीं आने दे रहे हों लेकिन वे हमारे परिवार के सदस्य हैं । आप इन्हें ऐसे नहीं रोक सकते। इनके घर पहुँचने का इंतजाम करिये। सरकार से ज्यादा शक्तिमान कोई दूसरी संस्था नहीं होती। बनाइये नीति , निकालिये रास्ता । बड़े लोगों के बेटों को लाने के लिए आर्डर निकल सकता है, इनके लिए क्यों नहीं । इनकी कमाई से भी आपके प्रदेश कि अर्थव्यवस्था को बल मिलता है। आपके शहर के बाजार गुलजार रहते हैं।
सिर्फ श्रमेव जयते का नारा लगाने से मजदूरों के घरों में बुलंदी नहीं आएगी बल्कि इनका जीवन स्तर बेहतर करना होगा।इसलिए बिहार- झारखण्ड के हुक्मरानों से निवेदन है कि वे अपना राजधर्म निभाएं। हमारे मजदूर भाई तो पग-पग पर अपना राष्ट्रधर्म निभाते आये हैं। ये मजदूर राष्ट्र गढ़ते हैं। इनकी उपेक्षा मत करिए।
जय जवान जय किसान!




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