कोरोना के संक्रमण को देखते हुए कानपुर चिड़ियाघर में बाघ और तेंदुए की विशेष देखभाल की जा रही है। किसी भी बीमा’री से बचाने के लिए उन्हें डाइटिंग कराई जा रही है। प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए इम्यूनो मॉड्यूलर ट्रीटमेंट दिया जा रहा है। प्रत्येक जानवर को पांच दिन का स्पेशल एंटीबायोटिक ट्रीटमेंट अलग से दिया जा रहा है। प्राणि उद्यान प्रशासन इन जानवरों की नाक बहना, खांसी या सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षण की मॉनीटरिंग बराबर कर रहे हैं। अमेरिका के न्यूयॉर्क के ब्रॉन्क्स जू में एक बाघिन के कोरोना पॉजिटिव होने और मध्य प्रदेश के पेंच टाइगर रिजर्व में बाघों के असामान्य व्यवहार के बाद ये कदम उठाए गए हैं।

कानपुर प्राणि उद्यान के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. यूसी श्रीवास्तव ने बताया कि बाघ और तेंदुए के लिए चिड़ियाघर का माहौल बेहद मुफीद है। इस समय यहां करीब 25 तेंदुए और आठ बाघ हैं। बाघिन त्रिशा ने यहीं पर अभी तक 17 बच्चों को जन्म दिया है। उनका इम्यून सिस्टम मजबूत करने के लिए विटामिन ए, डी, ई और एच का ट्रीटमेंट दिया जा रहा है। पांच दिन का एंटीबायोटिक कोर्स अलग से चल रहा है। भोजन में विटामिन और मिनरल्स की मात्रा बढ़ाई गई है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए डाइटिंग भी कराई जा रही है। मांसाहारी जीवों के खाने की खुराक एक से दो किलो घ’टाई गई है। बड़े बाघ को दस किलो की बजाय आठ किलो, छोटे बाघ को नौ की जगह सात किलो और तेंदुए को चार की जगह तीन किलो मीट दिया जा रहा है। सफाई और सेनेटाइजेशन पर खास जोर है।
किलकारियों से गूंज रहा है चिड़ियाघर
इंसानी दखल रुकते ही चिड़ियाघर में पशु-पक्षियों का स्वभाव बदल गया है। पक्षियों के केयरटेकर साहब लाल ने बताया कि पहली बार गर्मियों में स्पॉट बिल्ड डक ने 12 बच्चे दिए हैं जबकि बतख की खास प्रजाति ने 30 बच्चों को जन्म दिया है। हिरणों की देखभाल करने वाले बृजेन्द्र कुमार ने बताया कि हग डियर, बार्किंग डियर, ब्लैक डियर और चीतल की ब्रीडिंग बढ़ गई है। संरक्षित प्रजाति की मादा ब्लैक डियर 15 दिन में चार बच्चे दे चुकी है। हग डियर ने दो हफ्ते में 4 बच्चों को जन्म दिया है। बार्किंग डियर ने छह बच्चों को जन्म दिया है। इतना ही नहीं सियार ने भी चार बच्चे देकर अपना कुनबा बढ़ा लिया है।
40 दिन में कोई जानवर बीमार नहीं हुआ
40 दिनों से दर्शकों का प्रवेश न होने से पशु-पक्षियों के व्यवहार और आचरण का अध्ययन कर रही डाक्टरों की टीम हैरत में है। लॉकडाउन में एक भी हिरण का हार्टफेल नहीं हुआ है। स्वभाव से बेहद कोमल और डरपोक हिरण आम दिनों में डरे-सहमे और दिनभर बाड़े में भागते रहते हैं। बाघों के केयरटेकर रविन्द्र यादव भी पशुओं में आए बदलाव से हैरत में हैं। छह साल का खूंखार बघीरा हो या बूढ़ा बाघ प्रशांत या फिर बाघिन त्रिशा, सभी दिनभर बाड़े में खेलते हैं। 25 तेंदुओं की देखरेख करने वाले दीपक कुमार ने बताया कि लॉकडाउन से अभी तक कोई बीमार नहीं पड़ा है जबकि पहले किसी न किसी में सुस्ती-बीमा’री की शि’कायत रहती थी। चिड़चिड़ापन खत्म हो गया है। सन्नाटे में सीताराम और गीता भेड़िए ने बाड़े में गहरी सुरंगे बना ली हैं। वहीं आक्रामक रहने वाले मानू, पवन और कृष्णा गैंडा कूल हो गए हैं।



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