सनातन धर्म में शंकराचार्य (Shankaracharya) की पदवी सबसे ऊंची है. इसकी शुरुआत आदि शंकराचार्य से हुई. उन्होंने भारत के चार कोनों में चार मठ की स्थापना की. उत्तर में ज्योर्तिमठ, दक्षिण में शृंगेरी मठ, पूर्व में जगन्नाथपुरी का गोवर्धन मठ और पश्चिम में शारदा मठ. तब से शंकराचार्य की परंपरा लगातार चलती आ रही है. शंकराचार्य का जीवन तमाम त्याग और तपस्या से भरा होता है. आपने शंकराचार्य के हाथ में बांस की डंडी या कपड़े से ढंका डंडा देखा होगा! क्या आपको पता है कि ये क्या है और शंकराचार्य क्यों हमेशा अपने साथ रखते हैं?
कौन हैं दंडी संन्यासी?
शंकराचार्य का चुनाव दंडी संन्यासियों में से होता है. दंडी संन्यासी का मतलब है जिसके हाथ में हमेशा दंड रहे. यह दंड उन्हें अपनी गुरु से दीक्षा लेने के बाद मिलता है. पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती (Shankaracharya Swami Nischalananda Saraswati) कहते हैं कि दंडी को संस्कृत में लिंग कहते हैं. लिंग का मतलब है प्रतीक या सूचक. दंडी को ‘विष्णु लिंग’ इंडिया भी कहते हैं, जिसका मतलब है भगवान विष्णु का प्रतीक. दंडी संन्यासी बनने के बाद बाकायदा गुरु अपने शिष्य को दंड प्रदान करते हैं. तभी वह दंडी संन्यासी कहलाता है.















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