पटना : बिहार विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश गर्म है. आपातकाल के विरोध की सियासत से निकले लालू प्रसाद यादव से लेकर रामविलास पासवान और नीतीश कुमार जैसे नेताओं के इर्द-गिर्द ही पांच दशक तक सिमटी रही बिहार की राजनीति में इस बार नया प्रयोग होता दिख रहा. बड़े दल सीटों के बंटवारे में उलझे हुए हैं तो वहीं छोटी पार्टियों के तरफ से 243 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान होने लगा है.

नई पार्टियां बिगाड़ेगी खेल
बिहार विधानसभा चुनाव अक्टूबर-नवंबर में होने वाला है. सभी बड़ी पार्टियां अपने गठबंधन के साथ चुनावी बिसात बिछाने में जुट गई है. वहीं मायावती की बसपा, प्रशांत किशोर की जन सुराज, पशुपति पारस की आरएलजेपी, आरसीपी सिंह की आप सबकी आवाज, शिवदीप लांडे की हिन्द सेना ने सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है. इसके अलावे एआईएमआईएम और कई छोटे दल जो चुनाव में बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारेंगे.

उपचुनाव में पीके को मिली शिकस्त
बात करें जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर की तो उन्होंने राज्य में दो साल से ज़्यादा लंबी पदयात्रा करने के बाद जन सुराज पार्टी बनाई है. चार सीटों पर उप चुनाव भी लड़ा और 10% वोट हासिल करने में कामयाबी हासिल की. जन सुराज को जीत तो नहीं मिली लेकिन चारों सीट का खेल बिगाड़ दिया. एनडीए को चारों सीट पर जीत हासिल हो गई महागठबंधन को नुकसान हुआ.

विधान पार्षद की जीत से खुला खाता
जनसुराज के समर्थन से एक विधान पार्षद की जीत हुई थी लेकिन वह पार्टी के गठन से पहले कामयाबी मिली थी. अभी हाल ही में गांधी मैदान में प्रशांत किशोर ने बिहार बदलाव रैली की है. रैली को लेकर जो दावा किया गया था इतनी भीड़ नहीं आई और आने वाले समय में बिहार बदलाव यात्रा शुरू करने वाले हैं. 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की उनकी तैयारी है.

पीके जीते नहीं हराने में निभाई भूमिका
राजनीतिक विशेषज्ञ का कहा कि अभी प्रशांत किशोर की जन सुराज को ही लीजिए तो पिछले साल विधानसभा उपचुनाव में चार सीटों पर इन्होंने असर डाला था खुद जीते तो नहीं लेकिन हराने में उनकी भूमिका रही.

छोटे दल टिकट भी बेचते हैं और इसलिए 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा करते हैं और इसके अलावा भी कई वजह होती है. दूसरे दलों को चंदा देने की जगह अपनी पार्टी को खड़ा कर एक अलग पहचान बनाने की कोशिश भी इसी का एक हिस्सा होता है.




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