
इस गांव के लोगों पर महात्मा बुद्ध का काफी प्रभाव था। क्योंकि, खुदाई के दौरान लोहा अथवा हड्डी के औजार नहीं मिले थे। इससे यह माना गया कि यहां शाकाहार लोग बसते थे। यहां मिले एनबीपीडब्ल्यू (नॉदर्न ब्लैक पॉलीस्ड वेयर) मिले हैं। उनकी कार्बन डेटिंग से उनकी आयु 32 सौ साल पुरानी पायी गयी। बौद्ध भिक्षुओं के ठहराव स्थल होने के कई और प्रमाण मिल हैं।यहां बर्तन के रूप में कटोरे (बॉल) मिले हैं। कटोरे का उपयोग बौद्ध भिक्षु अनाज मांगने के काम में लाते थे। कई कुआन के साथ ही 5 कमरों के होने के अवशेष मिले हैं। 3 से साढ़े 3 हजार साल पुराना तांबा का सिक्का मिला, जिसपर नंदी के चिह्न बने हैं। कई छोटे-छोटे खिलौने और औजार मिले हैं। रुटाई में मिले सामान जुआफरडीह में मिले अवशेषों के समान हैं।

यहां भगवान बुद्ध के आगमन की किवदंती है। गांव के पास टीले पर चीनी यात्री फाह्यान के ठहरने की भी बात कही जाती है। लोग इसे किसी सभ्यता व संस्कृति से जोड़कर देख रहे हैं। इन मृदभांड को 1200 ई पूर्व से लेकर 200 ई पूर्व तक का बताया जा रहा है। उत्खनन में मिट्टी के बर्तन, मानव ह’ड्डी, रिंग वेल, अनाज के दाने, मिट्टी का फर्श, मिट्टी के मनके, चित्रित धूसर मृदभांड, नगरीय व्यवस्था के अवशेष, पांच कमरों का मकान सहित कई अवशेष मिले हैं।

यहां भगवान बुद्ध के आगमन की किवदंती है। गांव के पास टीले पर चीनी यात्री फाह्यान के ठहरने की भी बात कही जाती है। लोग इसे किसी सभ्यता व संस्कृति से जोड़कर देख रहे हैं। इन मृदभांड को 1200 ई पूर्व से लेकर 200 ई पूर्व तक का बताया जा रहा है। उत्खनन में मिट्टी के बर्तन, मानव ह’ड्डी, रिंग वेल, अनाज के दाने, मिट्टी का फर्श, मिट्टी के मनके, चित्रित धूसर मृदभांड, नगरीय व्यवस्था के अवशेष, पांच कमरों का मकान सहित कई अवशेष मिले हैं।




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