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आखिरकार पीने का बहाना मिल ही गया – देवेंद्र प्रसाद सिंह

आखिरकार पीने का बहाना मिल ही गया
– देवेंद्र प्रसाद सिंह

हुकूमत-ए- बिहार ने वहां के बाशिंदों का क्या हाल बना रखा है.बीते 12 फरवरी को मैंने अपनी आंखों से देखा, मेरे एक दोस्त की बेटी की शादी थी.
बरात बिहार से आई थी. दरवाजा शाम में लगना था.
लेकिन बारात सुबह में ही जमशेदपुर आ गई थी.
जनवासे तक गाड़ियां पहुंची. किसी ने भीतर झांक कर भी नहीं देखा कि लड़की वाले ने उनके रहने – सहने की कैसी व्यवस्था की है. बैग अटैचीया भीतर फेकी.लड़की वाले की तरफ से लोग नाश्ते के पैकेट लिए मनुहार करते रहे, लेकिन कौन रुकता है. अधिकतर लोग बाजार की और भागे. सिर्फ पानी की बोतलें थामी और पैदल ही बाजार का रास्ता पकड़ लिया. उनकी नजरें श’राब की दुकानें ढूंढ रही थी. अभी थोड़ी देर पहले ही सवेरा हुआ था. दुकानें खुली नहीं थी. इसी बीच एक दुकान नजर आई. लेकिन बंद थी. कोई बात नहीं. सभी रुक गए वहीं. चक्कर का’टने लगे. कुछ ने सुलभ शौचालय की सेवा ली. लेकिन ध्यान मयखाने पर ही टंगा रहा. डेढ़ दो घंटे बाद दुकान वाले साहब आए. बराती वाले सांपों के चेहरे की रंगत खिल गई अभी वह दुकान खोल ही रहे थे कि सारे लोग वहां पहुंच गए बेचारा थोड़ी देर के लिए ड’र ही गया उनके चेहरे की रंगत भापकर इन लोगों ने आने का मकसद बताया दुकानदार खुश हुआ ऊपर वाले को मन ही मन शुक्रिया और धन्यवाद दिया कहा- आपकी कृपा से आज की बोहनी शानदार रहेगी.

बिना लक्ष्मी गणेश की पूजा किए ही पैसे लेने और 1 एक कर बोतल देने लगा जो कीमत मांगी मिलती गई कोई उजूरोएतराज नहीं. कोई भाई लोग वही शुरू भी हो गए. बाद में दुकानदार ने ही मना किया कहा कोई सेफ जगह ढूंढ लीजिए वरना पुलिस के चक्कर में पड़ जाएंगे सार्वजनिक स्थान पर श’राब पीना मना है फिर क्या था भारतीयों ने चार ऑटो भाड़े पर लिए, अपने अपने माल के साथ सवार हो गए जब जनवासे पहुंचे तो हर बाराती इन्हीं की ओर देख रहा था मानो इनकी तो लॉटरी लग गई और वह सोते ही रह गए, क्या बुड्ढा क्या जवान हर कोई इन्हीं से आकर चिपकने लगा. इनमें कुछ जमीन वाले भी थे जिन्होंने मयकदे का पता पूछा. ऑटो वाला तब तक पूरा माजरा समझ चुका था एक ने तपाक से कहा- चलिए न बाबू हम चारों वहीं से आए हैं. ऑटो वाले की भी किस्मत भोरे-भोरे करवट बदल रही थी देखते-देखते चारों ऑटो फिर भर गए. दो फिर उस दुकान पर पहुंचे, दो आगे वाली दुकान पर आना-जाना लगा रहा बाद में दुकानदार ने हाथ उठा दिए, दो दुकान खाली हो चुकी थी. इन दोनों ने आधे दिन शराब बेची और शाम में चाय.

आप बताइए कैसे जी रहे हैं वहां के लोग! उनका दारू गटकना देख कर ऐसा लग रहा था मानो मुद्दतों से प्यासे हो. संयोग से यह झारखंड की बारात मिल गई कि इसी बहाने जमशेदपुर चले आए कतरा-कतरा को तरसने वाले लोगों को समंदर मिला था. उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था खूब पी छककर पी इतनी पी की कपड़ों का होश भी नहीं रहा. जब बारात दरवाजा लगाने चली तो मंजर देख कर मैं हैरत में पड़ गया. बराती तो बाराती, कार से नीचे उतर दूल्हा भी नाच रहा था. क्या कमाल का नागिन डांस था दांतों में रुमाल फंसा ऐसे लहरा रहे थे मानो नागों का जोड़ा मेटिंग सीजन में विराने जंगल में नाच रहा हो. नागिन डांस की इतनी खूबसूरत कला बिहार में अब विलुप्त होने के कगार पर जा पहुंची है. जाहिर सी बात है कि इसे इसके लिए कलाकार नहीं सरकार जिम्मेवार है मुझे लगता है आने वाले चुनाव में यह दिल्ली के ‘शाहीन बाग’ की तरह बड़ा मुद्दा बनेगा.

खैर दरवाजे लगने के वक्त स्वागत की माला मैंने ऐसे मेहमान को पहनाई जो जमीन पर लेटकर डांस कर रहा था. फिर पूछ ही लिया, बड़े दिनों के बाद मिली हैं क्या दारू ? उसने कहा- नही, बीच-बीच में पूजा के बहाने बाबाधाम(देवघर) जाते रहते है. एक बार एक महीने में दो बार चला आया तो पत्नी को शक हुआ. उसने आँखें घुमाते हुए पूछा क्या बात है, आजकर बाबा नगरिया बहुत जा रहे हो, कही कोई चक्कर-वक्कर तो नही? मैंने दोनों हाथ कान पर रखकर दांतों तले जीभ दबाते हुए कहा- राम-राम, भोले बाबा के नाम पर भी शक करती हो? पत्नी बोली- नही-नही शक की बात नही है! मैं कह रही थी कि अकेले- अकेले चले जाते हो पूजा करने, मेरा भी मन करता है बाबा के दर्शन को जाऊं अब मैडम को लेकर कैसे जाऊं बाबाधाम? जाना बंद है. बड़े दिनोवक बाद एक दमदार बहाना मिला बारात का। पत्नी ने टोक सकती थी और न ही चलने की जिद कर सकती थी, यहां बैठे तो मिल बैठे चार यार….फिर क्या कहना

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