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बिहार का सबसे बड़ा अस्पताल बेहाल, PMCH में 6 माह से HIV और 5 दिन से लिवर फंक्शन टेस्ट बंद

बिहार के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (PMCH) में मरीजों की क्लीनिकल पैथोलॉजी जांच नहीं हो पा रही है। मरीजों को प्राइवेट लैब जाना पड़ रहा है, जो जेब से लेकर सेहत पर भारी पड़ रहा है। हर दिन लगभग 20 छोटे बड़े ऑपरेशन होते हैं, जिसके लिए जांच बाहर से करानी पड़ती है।

OPD में भी आने वाले लगभग 25 प्रतिशत मरीजों का इलाज शुरू होने से पहले बाहर से 15 सौ की जांच करानी पड़ रही है। सरकार PMCH को लेकर बड़े-बड़े दावे कर रही है, लेकिन सामान्य जांच के लिए मरीजों को प्राइवेट पैथोलॉजी जाने में सिस्टम की पोल खुल रही है। जांच सिस्टम के फेल होने से मरीजों को दलाल अपने जाल में फंसा रहे हैं।

लगभग 6 माह से HIV, Hbsag और Hcv की जांच नहीं हो रही है। HIV और लिवर की सामान्य जांच नहीं होने से मरीजों को ऑपरेशन से लेकर इलाज तक में बड़ी बाधा आ रही है। यह ऐसी जांच है जो हर छोटे बड़े ऑपरेशन के पहले कराई जाती है। पेट से संबंधित इलाज के लिए भी लिवर की जांच आवश्यक है, लेकिन PMCH में जांच की कोई व्यवस्था नहीं है। पिछले 5 दिनों से लीवर फंक्शन टेस्ट भी ठप है। मरीजों को इस जांच को बाहर से कराने में 15 सौ से अधिक रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं।

किस जांच के लिए कितना करना पड़ रहा खर्च

HIV – एड्स की जांच 300 रुपए Hbsag हेपेटाइटिस की जांच 250 रुपए Hcv लीवर की जांच वायरस का पता लगाने के लिए 300 रुपए Lft लिवर के फंक्शन का टेस्ट 700 रुपए

जांच क्यों नहीं?, कोई बताने वाला नहीं

पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में लिवर और एड्स की जांच क्यों नहीं हो रही है, इसकी जानकारी कोई नहीं दे रहा है। मरीजों को बस यही बता दिया जा रहा है कि केमिकल और किट नहीं होने से जांच नहीं हो रही है। कोई भी जिम्मेदार जांच को लेकर मुंह नहीं खोल रहा है। ऑपरेशन और इलाज के पहले होने वाली इस अहम जांच के नहीं होने से मरीजों की परेशानी पर भी कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

हर दिन 20 ऑपरेशन, 25 प्रतिशत OPD के मरीजों की कमी

हर दिन पटना मेडिकल कॉलेज में छोटे-बड़े 20 ऑपरेशन होते हैं। इसके अलावा OPD में आने वाले कुल मरीजों में 25 मरीजों की जांच कराई जाती है। इसमें गैस्ट्रो विभाग के 90 प्रतिशत मरीज शामिल होते हैंं। PMCH के क्लीनिकल पैथोलॉजी में जांच नहीं होने से मरीजों को बाहर जाना पड़ रहा है। ऐसे में दलाल एक्टिव हो गए हैं। बीमारियों की जांच के लिए मरीजों को बाहर भेजा जाना उनकी जेब पर भारी पड़ रहा है।

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