दीपावली यानी दीपों का त्योहार है। लेकिन, अब लोग दीपावली में दीप जलाने की बजाय बिजली के रंगीन बल्बों से घरों को सजाना ज्यादा पसंद करने लगे हैं। यही कारण है कि दीपावली के मौके पर जितना उल्लास कुम्हारों के मोहल्लों में कुछ साल पहले तक होता था, वह अब नहीं दिखता।
सतरंगी लरियों के बढ़ते क्रेज के कारण दीये की लौ कम होती जा रही है।दीये की मांग घटने से कुम्हारों का पुश्तैनी धंधे पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि अब दीपावली में पूजा तक ही मिट्टी के दीये का उपयोग लोग करते हैं। पहले ऐसा नहीं था। कुम्हारों का कहना है कि मिट्टी के दीये की मांग 50 फीसदी तक कम हो गयी। शहर ही नहीं ग्रामीण इलाकों में भी दीये की मांग पहले की तरह नहीं है।



दीपावली के साथ छठ की तैयारी :कुम्हार परिवार दीपावली के साथ छठ की भी तैयारी में जुटे हैं। दीपोत्सव के लिए दीये और खिलौने बना रहे हैं तो छठ के चूल्हा, ढकनी और कपनी। उनका कहना है कि एक पर्व के भरोसे रहेंगे तो उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा। एक कुम्हार हर दिन करीब पांच से छह सौ दीये बना लेते हैं।




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