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नालंदा का शीतला माता मंदिर, चीनी चात्री फाह्यान से जुड़ी है मंदिर की कहानी, खुदाई में मिली थी मां की प्रतिमा

नवरात्रि के पांचवें दिन सोमवार को मां दुर्गा के स्कंदमाता स्वरूप की पूजा की जा रही है। ऐसे में आज हम बता रहे हैं नालंदा के मघड़ा गांव स्थित शीतला माता मंदिर के बारे में। मान्यता है कि मंदिर के पास स्थित तालाब में नहाने से चर्म रोग से लोगों को मुक्ति मिलती है। मंदिर के पुजारी नीलमणि पाठक बताते हैं कि पूर्वजों के अनुसार, चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय चीनी चात्री फाह्यान ने पूजा की थी। माता की प्रतिमा यहां खुदाई में मिली थी।

पुजारी नीलमणि पाठक के अनुसार, शीतला माता मंदिर को लेकर मान्यता है कि यहां श्रद्धालुओं को निरोगी काया की प्राप्ति होती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, गांव के एक राजा वृक्षकेतु के स्वप्न में माता आईं थी। माता ने स्वप्न में पंचाने नदी किनारे की जमीन में प्रतिमा के दबे होने की बात बताई। माता के आदेश के बाद राजा ने उक्त जमीन की खुदाई कराई तो वहां से मां की प्रतिमा मिली, जिसे बाद में पास में मंदिर बनाकर उन्हें स्थापित कर दिया गया। वही आज मघड़ा गांव के शीतला मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।

पुजारी नीलमणि पाठक बताते हैं कि जिस दिन मां शीतला की मूर्ति मिली थी, उस दिन चैत्र कृष्ण पक्ष की सप्तमी थी। अष्टमी के दिन मां की प्रतिमा की स्थापना हुई थी। उसी समय से मघड़ा में मेला की शुरुआत हुई, जो अब तक जारी है। जहां पर खुदाई की गई थी, उस स्थान ने कुएं का रूप ले लिया। आज इसे मिठ्ठी कुआं के रूप में जाना जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार इस कुएं का पानी आज तक नहीं सुखा है। श्रद्धालु इस कुएं की भी पूजा जरूर करते हैं।

पुजारी नीलमणि पाठक के अनुसार, मघड़ा गांव स्थित माता शीतला मंदिर में दिन में दीपक नहीं जलते हैं। धूप, हुमाद और अगरबत्ती जलाना भी मना है। भगवान सूर्य के अस्त होने के बाद ही मंदिर में माता की आरती उतारी जाती है और हवन होता है। हर दिन सुबह में माता को दही और चीनी से स्नान कराया जाता है। सूर्यास्त के बाद सबसे पहले मंदिर के पुजारी दीपक जलाकर आरती करते हैं।

भगवान सूर्य के अस्त होने के बाद ही मंदिर में माता की आरती उतारी जाती है और हवन होता है।

भगवान सूर्य के अस्त होने के बाद ही मंदिर में माता की आरती उतारी जाती है और हवन होता है।

मंदिर के गर्भगृह में काले पत्थर की 12 इंच लंबी मां शीतला की प्रतिमा स्थापित है। प्रतिमा के मुकुट के ऊपर नौ रेखाएं हैं, जो नौ देवियों का प्रतीक माना जाता है। मां की दायीं ओर सूर्य और बायीं ओर चन्द्र हैं। माता की चार भुजाएं हैं। एक हाथ में कलश है। दूसरे में श्री शीतलाष्टक की पुस्तक है। तीसरे हाथ में विषहरणी नीम की डाली और चौथे हाथ में विभूति और फल की झोली है। इस मंदिर में प्रत्येक मंगलवार को श्रद्धालुओं की काफी भीड़ होती है। मां के प्रांगण में रामनवमी के अवसर पर ध्वजा स्थापित करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।

मंदिर के पुजारी मिथलेश पंडित और नीलमणि पण्डा ने बताया कि प्राचीन काल से चैत्र कृष्ण पक्ष सप्तमी के दिन बसिऔरा मनाने की परंपरा चली आ रही है। इस कारण मघड़ा, पचौड़ी, राणा बिगहा, जोरारपुर, वियावानी, जमालीचक, कथौली समेत आसपास के कई गांवों में चूल्हे नहीं जलते है। इन गांवों में एक दिन पूर्व शाम में ही खाना बना लिया जाता है। अष्टमी के दिन रात में लोग बनाये गये खाने को बसिऔरा (बासी भोजन) के रूप में ग्रहण करते हैं।

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