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अद्भुत: तपस्या से प्रसन्न होकर बरेली के इस मंदिर में विराजमान हुए थे स्वयं भगवान शिव ‘ॐ नमः शिवाय’

चारों ओर घनी हरियाली। पास में कल-कल बहती रामगंगा की अविरल धारा। गूंजते वेद मंत्र और हवन से उठता पवित्र धुआं…। लोग बताते हैं सैकड़ों वर्ष पूर्व कुछ इसी तरह दिखता था श्री तपेश्वर नाथ मंदिर का दृश्य। कालांतर में इसका स्वरूप अवश्य बदल गया, पर लोगों की अटूट आस्था बरकरार है।

मंदिर में ये भी मिला प्रमाण : सुभाषनगर में स्थित यह मंदिर पूर्व में ऋषि-मुनियों की तपस्थली रहा है। लोकमान्यता है कि मंदिर के बगल से होकर रामगंगा नदी बहती थी। स्थानीय निवासी आलोक तायल बताते हैं कि वर्ष 2004 में यहां ट्यूबवेल लग रहा था। दिल्ली से भूगर्भ वैज्ञानिकों का दल आया हुआ था। धरती की कोख से निकलने वाली रेत, मिट्टी आदि का अध्ययन कर उन्होंने भी यहां कभी नदी होने की पुष्टि की थी। यहां की रेतीली भूमि भी इसका एक प्रमाण है।

इसलिए कहलाए तपेश्वरनाथ : हिमालय से लौटते हुए ध्रूम ऋषि के एक शिष्य ने यहां सैकड़ों वर्षों तक तप किया था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव यहां विराजमान हुए और उनका नाम तपेश्वरनाथ पड़ा। मान्यता है कि बाद में यहां भालू बाबा ने करीब चार सौ वर्ष तक तपस्या की। उनके शरीर पर अत्यधिक बाल होने के कारण उनको लोग भालू बाबा कहते थे। वह गुफा बनाकर रहते थे। यह स्थान कई संतों की तपस्थली रहा। आज भी दूर-दराज से यहां संत आकर तपस्या करते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद लेकर जाते हैं। खासकर मई-जून की गर्मियों में वह चारो तरफ से आ’ग ज’लाकर बीच में तपते हैं।

राधा-कृष्ण व नवदुर्गा मंदिर भी है स्थापित : परिसर में राधा-कृष्ण एवं नवदुर्गा मंदिर भी बने हुए हैं। पहले यहां शीतला माता का मंदिर हुआ करता था। बाद में भक्तों के सहयोग से इसका जीर्णोद्धार कराकर नवदुर्गा मंदिर का निर्माण कराया गया और माता शीतला की प्राचीन मूर्ति की फिर से स्थापना कराई गई।

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