राज्य में सरकारी स्कूलों के लिए शिक्षक नियोजन की प्रक्रिया चल रही है। लेकिन, सबसे बुरी स्थिति उर्दू में है। एससी- एसटी वर्ग में उर्दू के शिक्षक ही कई जगह नहीं मिल रहे हैं। आरा नगर निगम में वर्ग 6 से 8 में उर्दू शिक्षक की तीन सीटें रिक्त थीं।
एक सीट गैर आरक्षित यानी यूआर में, ईबीसी में एक सीट और एसटी की एक सीट रिक्त थीं। इन तीनों सीटों में से यूआर और इबीसी में तो अभ्यर्थी आए पर एसटी वर्ग में किसी का चयन नहीं हो पाया। जानकारी है कि इस वर्ग में कोई आवेदन ही नहीं आया था।
इस तरह खाली रह जा रही उर्दू एससी वर्ग में सीटें
आरा नगर निगम में वर्ग 1 से 5 में भी उर्दू शिक्षकों की सारी रिक्तियां नहीं भर पाईं। वर्ग 1 से 5 में कुल 25 रिक्तियां थीं। इसमें यूआर में 2, यूआर फीमेल में 2, ई डब्ल्यू एस (इनोनॉमिकली वीकर सेक्सन) में 4, ई डब्ल्यू एस एफ (इनोनॉमिकली वीकर सेक्सन, महिला) में 3 सीट, ईबीसी में एक और बीसी में 2 , बीसी एफ में भी 2, एससी में 4 और एससी एफ में भी 4 सीटें रिक्त थीं। आरएएफ (रिजर्व फॉर फीमेल) में एक सीट रिक्त थीं। इसमें एससी की 4 सीटें और एससी एफ की भी 4 सीटें खाली रह गईं।
इसकी वजह समझिए
यह जरूरी है कि अनुसूचित जाति और जनजाति को भी आरक्षण के नियम के अनुसार जगह दी जाए। उसी अनुसार रिक्तियां भी निकालीं जाती हैं। मुसलमानों में अनुसूचित जाति नहीं है। एससी की करें तो मुसलमानों में एससी भी नहीं होते हैं और हिंदू एसटी या हिंदी एससी बहुत कम हैं जो उर्दू पढ़ते हैं। नतीजा उर्दू में ये सीटें खाली रह जा रही हैं। ज्यादातर जगहों पर यही हुआ कि उर्दू में एससी की सीटों पर कोई आवेदन ही नहीं आए और सीटें खाली रह जा रही हैं। इसका असर उर्दू बच्चों की पढ़ाई पर पढ़ना तय है।


एससी में शामिल करने की मांग वर्षों से उठ रही है
मुसलमानों में मेहतर, डफाली जैसी कई जातियां हैं, जिनको अनुसूचित जाति में शामिल किया जा सकता है। इसकी मांग भी वर्षों से चल रही है। लेकिन, इन्हें दलित जातियों की मान्यता नहीं मिली है। इसके लिए संविधान में संशोधन करना होगा। दलितों को आरक्षण देने की कारण उनसे जुड़ा छूआछूत है। दूसरी तरफ छूआछत की बात इस्लाम में नहीं है। इस कारण भी हिंदू दलितों की तरह काम- काज करने वाली मुसलमान जातियों को एससी नहीं माना गया और उस आरक्षण का लाभ भी नहीं मिल पाया है।

वर्षों पहले प्रो. जाबिर हुसेन ने सरकार को यह सुझाव दिया था कि मुसलमानों की एससी की सीटें खाली रह गईं तो अतिपिछड़ी जातियों से भरी जाएं। प्रस्ताव यह भी था कि जन्म के बजाय पेशा को जातीय निर्धारण को आधार बनाएं और उससे जुड़े लाभ दिए जाएं। लेकिन, यह भी ऑफिसियली नहीं हो पाया। प्रो. जाबिर हुसेन ने ‘ बिहार की पिछड़ी मुस्लिम आबादियां ‘ नाम से 94 में हिंदी और उर्दू में किताब लिखी जिसमें इन जातियों के बारे में विस्तार से विवरण है और आरक्षण के लाभ से वंचित रहने का कारण व सुझाव भी। डॉ.एजाज अली और अली अनवर जैसे नेताओं ने भी मुसमानों की दलित जातियों के सवाल पर आंदोलन किया पर अब तक यह मुकाम तक नहीं पहुंच पाया है।



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