अब बिहार के लोग भी थाईलैंड और वियतनाम के मशहूर फल लौंगन का स्वाद चख सकेंगे। मुजफ्फरपुर के मुसहरी स्थित राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र में इसकी बागवानी की जा रही है। करीब 100 पौधे लगे हुए हैं। इसमें अभी फल भी लगा है। इतना ही नहीं जिले के किसानों को इसका पौधा लगाने के लिए प्रोत्साहित भी किया जा रहा है।
राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. श्रीधर पांडेय ने बताया कि यहां से कई किसान इसका पौधा लेकर गए हैं। दूसरे किसानों को इसके लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों में यह काफी मशहूर है। यह लीची कुल (खानदान) का ही पौधा है। खाने में बिल्कुल मीठा है। लीची के पत्ते की तरह इसके भी पत्ते हैं। पेड़ भी वैसा ही होता है।
छिलका, पल्प और बीज भी लीची जैसा
डॉ. पांडेय बताते हैं इसका फल भी लीची जैसा होता है। पहले छिलका, फिर पल्प यानी गुदा और अंत मे बीज। बस यह लीची की तरह लाल नही होता और अंडाकार नहीं होता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि कीड़े-मकोड़े इसमें अधिक नहीं लगते हैं। इसका सीजन भी लीची जैसा होता है। बस अंतर यह है कि लीची का समय समाप्त होने के एक माह बाद तक भी यह रहता है।
जूस बनाने की चल रही रिसर्च
उन्होंने बताया कि यहां के लोग लीची का स्वाद ले चुके हैं। इसलिये वे ज़्यादा इसे पसंद नहीं करते हैं। फिर भी वे किसानों के जरिए इसका प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। फल की डिमांड कम है। इसे देखते हुए अब इसका जूस बनाने को लेकर रिसर्च चल रहा है। लीची के फल के साथ इसे मिक्स कर जूस तैयार करने पर रिसर्च किया जा रहा है।





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