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कोरोना काल के हीरो: पटना में महज 225 रु. में भरे जा रहे बड़े ऑक्सीजन सिलिंडर, NGO और छोटे जरूरतमंदों के लिए फ्री सर्विस

पटना. कोरोना संक्रमण के इस दौर में इंसान को दवा के साथ जिसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है वह है ऑक्सीजन सिलिंडर. इस संकट काल में एक तरफ जहां ऑक्सीजन की किल्लत से कई जानें चली गई हैं, वहीं कुछ ऐसे लोग हैं जो इस क्राइसिस के समय लोगों तक लगातार ऑक्सीजन मुहैया कराने के कार्य में लगे हुए हैं. बिहार में पटना के संजय भरतिया कोरोना काल के हीरो बनकर उभरे हैं जो किसी भी मीडिया की सुर्खियों से परे और किसी भी प्रचार से दूर चुपचाप लोगों तक ऑक्सीजन पहुंचाने के काम में लगे हुए हैं.

पटना के संजय भरतिया मैन्यूफैक्चरिंग के बिजनेस में है और साथ में एक ऑक्सीजन प्लांट के मालिक भी हैं. दीदारगंज से फतुहा जाने के रास्ते में सबलपुर में पाटलिपुत्र नाम से इनका प्लांट है. कोरोना जब पीक पर नहीं था तब इनके प्लांट से 1000 बड़े सिलिंडर रोज निकलते थे. तब अस्पतालों की ज़रूरत मात्र 15  से 20 प्रतिशत ही हुआ करती थी. लेकिन, जैसे ही कोरोना संक्रमण बढ़ा और ऑक्सीजन सिलिंडर की डिमांड अचानक बढ़ गई तो संजय ने इमरजेंसी के तहत प्रोडक्शन को प्रति दिन लगभग ढाई हजार सिलिंडर कर दिया. इनकी फ़ैक्ट्री में लगातार काम चल रहा है और जरूरतमंदों तक लगातार ऑक्सीजन सिलिंडर पहुंचाया जा रहा है.

संजय भरतिया ने कोरोना संक्रमण को देखते हुए और लोगों के साथ साथ अस्पतालों को ऑक्सीजन की जरूरत के हिसाब से सिलिंडर पर पहला हक अस्पतालों का कर दिया और उनकी फैक्ट्री से अधिकतर ऑक्सीजन अस्पतालों और ज़रूरतमंदों को दिया जा रहा है. यही नहीं संजय के प्लांट से महज 225 रुपये में ही बड़े सिलिंडर को रीफ़िल कर दिया जा रहा है. जिनके पास भी खाली सिलिंडर है वो संजय के प्लांट में पहुंच रहे हैं और उनका ख़ाली सिलिंडर रीफ़िल हो जा रहा है।
इसके साथ ही संजय ने एक और बड़ा फ़ैसला किया है. इस संकट की घड़ी में जो भी NGO कोरोना संक्रमण के मरीज़ों की सेवा में लगे हुए हैं उन सभी NGO को फ़्री में औक्सऑजन रीफिल कर दे रहे हैं. साथ ही जो छोटे सिलिंडर लेकर पहुंच रहे हैं उन्हें भी जरूरत के हिसाब से मुफ्त सुविधा मिल रही है. संजय भरतिया कहते हैं कि मैंने जब प्लांट लगाया था तब तो ये सोचा भी नहीं था कि एक दिन ऐसा भी समय आएगा. शायद भगवान ने मुझे ये मौका दिया की मैं लोगों की सेवा कर सकूं. इसके लिए ईश्वर को मेरा पूर्ण समर्पण.

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