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पद्म पुरस्कारों में बिहार की महिलाओं का परचम, अबतक 15 को मिला देश का यह सर्वोच्च सम्मान

बिहार की महिलाओं में सबसे पहले सन् 1974 में बिहार कोकिला स्व. विंध्यवासिनी देवी को लोक गायन के क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिए पद्मश्री से नवाजा गया था। सन् 1975 में मधुबनी के जितवारपुर की रहने वाली जगदम्बा देवी ने सबसे पहले मिथिला चित्रकला को पद्मश्री दिलवाया। उसके बाद तो मानो इस कला का पद्म पुरस्कारों में खाता ही खुल गया। सीता देवी (जितवारपुर, मधुबनी) को 1981 तो गंगा देवी (रसीदपुर, मधुबनी) को सन् 1984 में पद्मश्री से नवाजा गया। छठ गीतों के लिए दुनियाभर में पर्याय बन चुकी मशहूर लोक गायिका शारदा सिन्हा को भारत सरकार ने जहां 2015 में पद्मश्री से वहीं 2018 में पद्मभूषण से सम्मानित किया। 

वंचित समाज के बीच शिक्षा और जागृति फैलाने वाली दुनियाभर में सिस्टर सुधा के नाम से ख्यात सुधा वर्गीस 2006 में यह सम्मान पा चुकी हैं। साहित्य के क्षेत्र में मैथिली व हिन्दी की लेखिका उषा किरण खान व  डॉ. शांति जैन पद्म अवार्डी बिहारी हैं। चर्चित स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. शांति जैन, किसान चाची राजकुमारी देवी और चनपटिया की विधायक भागीरथी देवी ने भी पद्म अवार्ड लेकर बिहार का नाम आगे बढ़ाया है।

इसी साल बिहार की दो चर्चित महिलाओं को पद्मश्री के लिए चुना गया है। गोवा की राज्यपाल चर्चित लेखिका मृदुला सिन्हा को मरणोपरांत यह सम्मान दिया गया है, वहीं दुलारी देवी मिथिला चित्रकला को 7वां पद्मश्री दिलाने वाली महिला बन गयी हैं। मिथिला चित्रकला के लिए ही 2011 में महासुंदरी देवी (रांटी, मधुबनी, 2017 में बौआ देवी (जितवारपुर, मधुबनी) और 2017 गोदावरी दत्ता (रांटी, मधुबनी) को पद्मश्री से नवाजा गया है।

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